शुक्रवार, अगस्त 4

सहारनपुर यातायात - बच्चे भी सुरक्षित नहीं !

सहारनपुर की सबसे बड़ी समस्या की ओर इंगित करना हो तो कहना होगा कि विभिन्न सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार जनित अकर्मण्यता हमारे नगर की सबसे बड़ी समस्या है फिर चाहे वह संभागीय परिवहन विभाग हो या पुलिस विभाग ।   शायद हमारे अधिकारियों का यह मानना है कि नियमित रूप से सुविधा शुल्क मिलता रहे तो दुनिया का कोई भी अपराध ऐसा नहीं है जिसे अनदेखा न किया जा सके।


परिवहन विभाग को ही लें। इस विभाग के अधिकारी दलालों के शिकंजे में इस कदर जकड़े हुए हैं कि आपकी गाड़ी यदि खंडहर हो चुकी हो तो भी फिटनेस मिल जायेगी, आपके खानदान में भी किसी को दूर - दूर तक ड्राइविंग न आती हो,  आपकी एक आंख फूटी हुई हो तो भी आपको वाहन चालक के नाते लाइसेंस घर बैठे - बैठे मिल सकता है। यदि आपकी जेब में पैसे हैं तो आप अपने बच्चे की प्रथम वर्षगांठ पर उसे ड्राइविंग लाइसेंस का उपहार (या श्राप ? ) दे सकते हैं।

और पुलिस विभाग ? पुलिस विभाग की तो जितनी प्रशंसा की जाये, कम ही है। अपराधियों के प्रति इतना सहयोग पूर्ण रुख किसी अन्य स्थान पर दुर्लभ ही होगा। चौराहे पर लकड़ी या बजरी से ऊपर तक लदी हुई ट्रेक्टर ट्रॉली पहुंचे तो ड्राइवर अपनी हथेली में पहले से ही पचास रुपये का नोट तैयार रखता है। चौराहे पर तैनात पुलिस कर्मी भी जिस सफाई से हथेली से हथेली मिलाता है, वह देखते ही बनती है। सहारनपुर के वाहन चालक ट्रैफिक जाम लगाने में महारत हासिल रखते हैं। जब तक पूरी तरह से सारे वाहन चौराहे पर एक दूसरे में उलझ न जायें, पुलिस कर्मी आस-पास नज़र भी नहीं आते। जब स्थिति विकराल रूप धारण कर ले तब पान या गुटका चबाता हुआ, डंडा हाथ में लिये हुए, मरियल सा एक पुलिस कर्मी  चौराहे पर पहुंचता है और यह समझ ही नहीं पाता कि अब इस जाम से कैसे निबटा जाये। दो-चार डंडे इधर-उधर फटकारता है, रिक्शा वालों के रिक्शा पर डंडा बजाता है भले ही जाम ट्रक, कार और मोटर साइकिल वालों की वज़ह से लगा हुआ हो और फिर सबको भगवान भरोसे छोड़ कर वहां से सरक लेता है।

ऐसे में क्या यह आश्चर्य की बात है कि स्कूल बस में बैठ कर स्कूल जाने वाले बच्चे भी सहारनपुर में सुरक्षित नहीं हैं और जब-तब दुर्घटनाओं के शिकार बनते रहते हैं? रिक्शे पर अनगिनत बच्चे ले जाने वाले रिक्शा चालक हमेशा से बच्चों की सुरक्षा के लिये खतरा माने जाते रहे हैं। अभिभावक इन रिक्शों से बजाय स्कूल बस में अपने बच्चों को भेज कर भी बच्चों की सुरक्षा के प्रति निश्चिंत नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें सबसे बड़ा दोषी परिवहन विभाग और पुलिस विभाग ही है। ड्राइवरों को वाहन चलाते समय मोबाइल फोन पर बतियाते अक्सर देखा जा सकता है। स्कूटर मोटर साइकिल पर भी गरदन तिरछी कर के फोन फंसा लिया जाता है और वाहन और बातचीत दोनों चलते रहते हैं। मियां जी स्कूटर चलाते हैं और पिछली  सीट पर बैठी उनकी अर्धांगिनी मोबाइल उनके कान पर सटाये रखती है और कई - कई किलोमीटर तक बातचीत चलती चली जाती है। समय-प्रबंधन की कला इसी को कहते हैं शायद !

जहां तक स्कूल बसों के सुरक्षित संचालन का संबंध है, हर स्तर पर सुधार की जरूरत है। परिवहन विभाग के अधिकारी तो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं ही जो खटारा बसों को फिटनेस प्रमाणपत्र देते हैं और उनकी अंतरात्मा उनको एक बार भी नहीं कचोटती । इस खटारा बस का लापरवाह ड्राइवर कितने खतरनाक ढंग से बस चला रहा है इसको लेकर ट्रेफिक पुलिस भी कतई चिंतित नहीं होती। अक्सर बस ड्राइवर वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करते रहते हैं या फिर बोनट पर बैठे हुए अपने सहायक से गप-शप मारते रहते हैं। बस में बैठी हुई अध्यापिकाओं और बच्चों को भी स्कूल पहुंचने की जल्दी होती है ताकि सजा न मिले। यदि कोई बस को सुरक्षित ढंग से चलाने के लिये ड्राइवर को समझाने का प्रयास करें तो न तो

ड्राइवर उनकी सुनते हैं और न ही स्कूल के प्रबंधकों के कानों पर जूं रेंगती है। स्कूल प्रबंधक बच्चों को यह सुविधा देने के नाम पर भी कमाई करना चाहते हैं। सस्ते से सस्ता सौदा पटाने के लिये यदि खटारा बस का भी अनुबंध करना पड़े तो उनको

इसमें कोई शर्म नहीं है जबकि अभिभावकों की जेब पर पूरी निर्दयता से चाकू चलाया जाता है। ड्राइवर और क्लीनर के द्वारा बीड़ी-सिगरेट-गुटका के प्रयोग पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। और अंत में, यदि कोई दुर्घटना हो जाती है तो

जिला-प्रशासन कुछ दिनों के लिये हरकत में आता है, कुछ अभियान छेड़े जाते हैं पर कुछ ही दिनों बात हालत वहीं की वहीं । दोषियों को सजा दिलाने के लिये भी हमारे देश में कई दशकों तक इंतज़ार करना होता है।

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