रविवार, अगस्त 6

रेखाएं (कविता)

स्मृति के पटल पर उभरती कुछ रेखाएं,
कुछ धुंधली-सी, कुछ उजली-सी,
कुछ सीधी कुछ टेढ़ी मेढ़ी
यादों के अध्भुत दर्पण में
नित बीतें चल-चित्र दिखलायें,
स्मृति के पटल पर उभरती कुछ रेखाएं

एकाएक मन को खीचती,
बचपन की यादों को सींचती
दिखलाती गलियों में दौड़ता बचपन,
तो कभी दोस्तों से होती अनबन
मन का कभी कटी-पतंग समान दौड़ना,
तो कभी जर्जर होती परम्पराएं तोडना
दिखलाता कभी हटीलें, उन्मुक्त बचपन की झांकी
तो कभी डांट पिता की और ममता माँ की,
नैनो को मूंद्तें ही मानो मन
स्वतः आनंद से भर जाएँ
स्मृति के पटल पर उभरती कुछ रेखाएं

प्रशंसा हर प्रयास की हर प्रयत्न की
कल्पना जीवित होती अपने हर स्वपन की
कभी मित्रों से होती सुविधा ,
तो कभी निर्णय में होती दुविधा
दौड़ना कभी बंद आँखों से, अपने लक्ष्य की ओर
तो कभी अकेलेपन का आभास होता चंहु ओर
भीड़ में कभी खुद को अलग सा पाना
तो कभी उसी भीड़ का बन हिस्सा, उसी में खो जाना
एक अनदेखें, अनसुझें लक्ष्य की करतें खोज
विचारों का आपस में, परस्पर लड़ना हर रोज़,
ऐसे न जाने कितने अनुभव
ज्ञान असीमित जीवन में भर जाएँ
स्मृति के पटल पर उभरती कुछ रेखाएं।

- अंकुर मल्होत्रा

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