बुधवार, अगस्त 16

सहारनपुर का दारुल उलूम देवबन्द

 सहारनपुर का दारुल उलूम देवबन्द 
दारुल उलूम देवबन्द का मुख्य भवन



दारुल उलूम में प्रवेश हेतु गैलरी तथा हाथ से तैयार किये गये समाचार पत्र

दारुल उलूम देवबन्द में छात्रावास ! 

दारुल उलूम मुख्य भवन के ठीक सामने स्थित प्रवेश द्वार 
सहारनपुर जनपद के देवबन्द नगर में स्थित दारुल उलूम व रशीदिया मस्जिद इस्लामिक शिक्षा के एशिया के सबसे बड़े केन्द्र के रूप में तो प्रसिद्ध हैं। इनका शिल्प सौन्दर्य, खास कर रशीदिया मस्जिद का शिल्प सौन्दर्य अत्यन्त चित्ताकर्षक है और देवबन्द को दर्शनीय स्थल के रूप में स्थापित करता है।

दारुल उलूम देवबन्द की स्थापना

30 मई 1866 को मदरसा इस्लामिया अरबी के नाम से आरंभ हुआ यह शिक्षण संस्थान कालांतर में दारुल-उलूम देवबन्द के रूप में प्रसिद्ध हुआ है। इसकी स्थापना का श्रेय मौलाना कासिम नानौतवी, रशीद अहमद गंगोही तथा हाजी आबिद हुसैन को जाता है।

शिक्षण कार्यक्रम

दारुल उलूम में चार स्तर पर शिक्षण पाठ्यक्रम चलते हैं –
  • प्राथमिक पाठ्यक्रम
  • माध्यमिक पाठ्यक्रम
  • स्नातक पाठ्यक्रम
  • स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम  (वैकल्पिक पाठ्यक्रम)
अरबी के आठ वर्षीय शिक्षण पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिये प्राथमिक शिक्षा सफलतापूर्वक पूरी करनी आवश्यक है। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में पत्रकारिता, तजवीज व किरात, बी.एड., कैलिग्राफी (सुन्दर लेखन), कंप्यूटर व अंग्रेज़ी विषय भी उपलब्ध हैं।

दारुल उलूम में प्रवेश के लिये लिखित परीक्षा और साक्षात्कार की प्रक्रिया निर्धारित है। यहां पर पवित्र क़ुरान, उसूले तफ़सी, अबीम, तासीर, हदीस, उसूले हदीस, फ़िका, तसव्वुफ़, इल्मुल फराइज़, इल्म अक़ाइदव कलाम आदि विषयों की शिक्षा दी जाती है। दारुल उलूम देवबन्द का परिसर आवासीय है और यहां शिक्षा-दीक्षा, होस्टल सुविधा आदि निःशुल्क है।

रूस, चीन, नेपाल, इंडोनेशिया, सीरिया, इराक, पाकिस्तान, सऊदी अरब, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, कंबोडिया, यमन, बांग्लादेश, थाईलेंड आदि देशों के विद्यार्थी यहां शिक्षा प्राप्त करने के लिये आमतौर पर आया करते हैं।

दारुल उलूम की स्थापना एक मदरसे के रूप में हुई थी, पर इसके कार्य और कार्यप्रणाली को देखते हुए अब इसे जामिया यानि विश्वविद्यालय माना जाता है। इसके इतिहास और महत्व को देखते हुए इसे विश्वविद्यालय से भी ऊपर का दर्ज़ा हासिल है।

दारुल उलूम देवबन्द की एक विशेषता यह भी है कि सन्‌ 1866 से लेकर आज तक यहां पर निर्माण कार्य सतत् चलता चला आ रहा है। जहां मुख्य इमारत का गुम्बद इसे एक विशिष्ट पहचान देता है, वहीं इसकी तीन मंजिला होस्टल की इमारत भी स्वयं में बहुत भव्य है।

फतवा

दारुल उलूम में 32 विभाग कार्यरत हैं जिनमें फतवा विभाग भी एक है। दारुल उलूम देवबन्द विभिन्न मुद्दों पर अपनी आधिकारिक राय व्यक्त करता है जिसे फतवा कहा जाता है। कोई भी मुस्लिम किसी विवादास्पद प्रश्न पर मुस्लिम विद्वानों को राय देने अर्थात्‌ फतवा देने का आग्रह / अनुरोध करता है तो दारुल उलूम देवबन्द का फतवा विभाग उस प्रश्न पर अपनी आधिकारिक राय देता है और मुस्लिम समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह इन फतवों के अनुरूप आचरण करे।

पिछले दो - एक दशक में कुछ फतवों में जो आधिकारिक विचार दारुल उलूम देवबन्द द्वारा व्यक्त किये गये उनको मुस्लिम समाज के प्रभावशाली तबके ने ही पुरातनपंथी और सुधार विरोधी कहते हुए तिरस्कृत किया है। खास तौर पर, मुस्लिमों को क्या पहनना चाहिये, क्या पढ़ना चाहिये, क्या देखना चाहिये, क्या करना चाहिये, क्या नहीं करना चाहिये – जीवन के इन नितान्त व्यक्तिगत मुद्दों पर फतवे मुस्लिम समुदाय आम तौर पर अस्वीकार करने लगा है। कुछ फतवों में कूप-मंढूकता स्पष्ट दिखाई देती है जैसे - फोटोग्राफी को इस्लाम विरुद्ध बताना, स्त्री – पुरुषों का एक साथ एक ही कार्यालय में नौकरी करना इस्लाम विरुद्ध घोषित करना ये सब फतवे खुद मुस्लिम समुदाय हास्यास्पद मानता है और इनकी परवाह करता प्रतीत नहीं होता। वन्दे मातरम्‌ गीत को गाने से मना करना भी ऐसा ही एक विवादास्पद फैसला रहा है। कुल मिला कर दारुल उलूम देवबन्द की विचारधारा को मुस्लिम समाज के अग्रणी तबके द्वारा ही पंथनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतिकूल व कट्टरपंथी माना जाने लगा है। तीन तलाक के मसले पर भी दारुल उलूम देवबन्द के पुरातनपंथी विचारों को मुस्लिम समुदाय में ही नकारा जाने लगा है। खास कर मुस्लिम महिलाएं इसके विरोध में खुल कर सामने आने लगी हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और भारत के संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध जाकर जब कोई फतवा दिया जाता है तो उसका प्रभाव बहुत सीमित स्तर पर ही हो सकता है।

कहा जा सकता है कि फतवा धार्मिक परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम विद्वानों द्वारा दिया जाने वाला गया एक सुझाव है जिसके पालन की अपेक्षा मुस्लिम समाज से की जाती है। परन्तु इस सुझाव की कितनी कद्र की जायेगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि मुस्लिम समाज में आधुनिक सोच रखने वाला प्रभावशाली तबका उसे स्वीकार करता है या नहीं! आम तौर पर जो अशिक्षित या अल्पशिक्षित, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्ग के लोग हैं वे फतवे के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं और सिर झुका कर उसे स्वीकार कर लेते हैं। फतवों का केवल नैतिक आधार होता है, यदि केन्द्र या राज्य की सरकार आपकी समर्थक है और आपके फतवों को सम्मान देती है तो इन फतवों का प्रभाव क्षेत्र व्यापक हो जाता है, अन्यथा ये फतवे मात्र एक सुझाव बन कर रह जाते हैं।

दारुल उलूम और देश की राजनीति मुस्लिम जनसंख्या पर दारुल उलूम के व्यापक प्रभाव को मानते हुए स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले कुछ राजनैतिक दल और उनके सर्वोच्च नेता चुनाव से पहले दारुल उलूम जाकर अपने पक्ष में अपील कराने का प्रयास किया करते हैं। दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम के पास जाकर उनसे अपने पक्ष में अपील कराना भी ऐसा ही एक प्रयास है। ऐसी किसी अपील का मुस्लिम मतदाताओं पर कितना प्रभाव पड़ता है, इसका आकलन करना तो कठिन ही है, परन्तु दारुल उलूम देवबन्द के उच्च अधिकारियों के अहं की संतुष्टि तो हो ही जाती होगी कि देश के बड़े - बड़े सेकुलर वादी नेता मुस्लिम वोट की चाहत में उनके दरवाज़े पर आकर सर झुकाते हैं, उनसे विनती करते हैं कि वह इन नेताओं के पक्ष में मतदान करने का आग्रह अपने समाज से करें।

कोई भी शिक्षण संस्थान अपने आकर्षक स्थापत्य और भवनों से महान नहीं बनता है।  वहां दी जाने वाली शिक्षा और शिक्षकों का मानसिक व बौद्धिक स्तर, देश व समाज के प्रति उनकि सोच ही किसी भी  शिक्षण संस्थान को महान या सामान्य बनाते हैं।   दारुल उलूम देवबन्द से बार - बार ऐसे संकेत मिलते हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि ये  अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्थान संकुचित विचारधारा का पोषण करने लगा है।  यही नहीं, ये सुधार विरोधी है और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर देश की सरकार, न्यायपालिका और संविधान के प्रति अपने संबंध निर्धारित करता है।

इस संस्थान द्वारा अपने वाइस - चांसलर गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को केवल इसलिये पद से हटा देना क्योंकि उन्होंने कहा था कि अन्य धर्मावलिंबियों की तरह गुजरात के मुस्लिमों ने भी प्रगति की है, यह संकेत करता है कि यह संस्थान उदार व व्यापक दृष्टि को स्वीकार नहीं करता है।

देश के प्रधानमंत्री के विरोध को इस सीमा तक ले जाना कि प्रधानमंत्री के निर्णयों व कार्यों की तारीफ करना भी इस्लाम विरोधी और अवांछनीय  माना जाने लगे, किस प्रकार की मानसिकता का द्योतक है, ये सहज ही समझा जा सकता है।   दारुल उलूम अपने छात्रों में किस प्रकार की पोंगापंथी और सांप्रदायिक मानसिकता भर रहा है, यह इसी बात से समझा जा सकता है कि दारुल उलूम के अधिकांश छात्रों ने भी अपने उप-कुलपति वस्तानवी की उनके पद से छुट्टी किये जाने पर खुशी का इज़हार किया।

देश के संविधान  और न्यायपालिका के प्रति भी इस संस्थान की सोच संकीर्ण और पुरातनपंथी प्रतीत होती है।  माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक के मुद्दे पर दिये गये फैसले की भी इस संस्थान के वर्तमान उपकुलपति मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी द्वारा यह कहते हुए आलोचना की गयी है कि देश का कानून और संविधान शरियत और मुस्लिमों के पर्सनल लॉ में छेड़छाड़ नहीं कर सकते।  ऐसी घातक विचारधारा रखने वाले संस्थान की देश को व समाज को कितनी आवश्यकता है, ये स्वयं मुस्लिम समाज के लिये चिन्ता का विषय होना चाहिये।    

रशीदिया मस्जिद







पिछले कुछ वर्षों में रशीदिया मस्जिद दारुल उलूम देवबन्द परिसर का प्रमुख आकर्षण बन गई है। इसका निर्माण बीस वर्षों में पूरा हुआ है। इस मस्जिद का 120 फीट ऊंचा गुम्बद, 180 फीट ऊंची मीनारें देवबन्द में दूर-दूर से दिखाई देती हैं। यदि आप ट्रेन से देवबन्द से सहारनपुर की ओर जा रहे हैं तो भी आपको रशीदिया मस्जिद की नभस्पर्शी मीनारें दूर से ही दिखाई देती हैं। रशीदिया मस्जिद में प्रवेश हेतु पांच द्वार हैं। संगमरमर और सफेद पत्थर से निर्मित इस भवन की शोभा पूर्णिमा की रात्रि में देखते ही बनती है और देखने वालों को ताजमहल की याद दिलाती है। कहा जाता है कि रशीदिया मस्जिद को इतना भव्य रूप दिया जा सकेगा ये कल्पना इसके निर्माताओं को दूर – दूर तक नहीं थी। पर जब निर्माण कार्य आरंभ हुआ और अथाह धन दान के रूप में आने लगा तो मूल नक्शे में परिवर्तन करके उसे और विस्तार दिया गया। आज इस मस्जिद में बीस हज़ार नमाजी एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं।     

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