शनिवार, अगस्त 5

सहारनपुर की स्थापना और राजा साहरनवीर सिंह

क्या आप जानते हैं कि आपके नगर की स्थापना किसने की थी?     सहारनपुर की स्थापना का श्रेय किसे जाता है? जब इस प्रश्न पर मैने माथा-पच्ची करनी आरंभ की तो दो व्यक्तियों के नाम बार - बार सामने आये -  एक राजा साहरन वीर सिंह और दूसरे शाह हारून चिश्ती।  शाह हारून चिश्ती के बारे में लोक कथा प्रचलित है कि सन्‌ 1340 में पांवधोई नदी के तट पर शाह हारून चिश्ती नाम के प्रसिद्ध सूफी संत के होने की सूचना मुहम्मद तुग़लक को मिली थी और बताया जाता है कि तुग़लक ने संत से मिलने के बाद फरमान जारी कर दिया था कि यह स्थान शाह हारूनपुर के रूप में जाना जाये।  यही शाह हारूनपुर बाद में बिगड़ते बिगड़ते सहारनपुर हो गया।

सहारनपुर की स्थापना के बारे में प्रचलित उक्त लोक कथा को इतिहास कार अनेक कारणों से अस्वीकार करते हैं ।  उनके तर्क मुख्यतः ये हैं :-
शाह हारून चिश्ती की दरगाह

  1. मुहम्मद तुग़लक और शाह हारून चिश्ती समकालीन नहीं थे ऐसे में तुग़लक के शाह हारून चिश्ती से मिलने की कथा केवल एक  काल्पनिक कथा है।
  2. शाह हारून चिश्ती की दरगाह सहारनपुर के मौहल्ला पीर में अवस्थित मानी जाती है।  पर यहां पर दो मजार हैं।  पीर  तो पीर थे - न कोई आगे, न कोई पीछे फिर यह दूसरी मजार किस की है? 
  3. मौहल्ला पीर हिन्दू बहुल क्षेत्र है।  इस दरगाह का नियंत्रण भी हिन्दुओं के पास ही है। मुख्यतः हिन्दू ही यहां  पर आकर पूजन - अर्चन करते हैं।  ऐसा क्यों है?
  4. हर वर्ष सहारनपुर में नगर भर से पूजन के पश्चात नकुड़ रोड स्थित गुग्घा पीर और  जौहर वीर की म्हाड़ी पर छड़ियां ले जाई जाती हैं और ईदगाह क्षेत्र में मेला भरता है।  ये छड़ियां इस दरगाह से भी होकर जाती हैं।  इसके पीछे क्या इतिहास है?
अतः इतिहासकारों की मान्यता है कि सहारनपुर की संस्थापक के रूप में राजा साहरन वीर सिंह के पक्ष में बेहतर  अभिलेख व ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं । इन साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि सहारनपुर को इसका ये नाम राजा साहरनवीर सिंह के नाम से मिला जिन्होंने अकबर के आदेश पर यहां चारदीवारी और चार दरवाज़ों से घिरी एक नगरी बसाई। पांवधोई नदी के तट के किनारे - किनारे नक्खासा, रानी बाज़ार, शाह बेहलोल और लक्खी गेट इस नगर के अंग थे और सराय गेट, माली गेट, बूड़िया गेट तथा लक्खी गेट - ये चार दरवाज़े थे।  ये चार दरवाज़े चार अलग - अलग मुहल्लों में आज भी किसी न किसी हालत में मौजूद हैं।  राजा साह रनवीर सिंह का किला खण्डहर के रूप में आज भी सहारनपुर के चौधरियान मुहल्ले में देखा जा सकता है।

राजा साहरनवीर सिंह के विषय में जब मैने पता लगाने का प्रयास किया तो उनके एक वंशज से बहुत रोचक मुलाकात हुई।  सहारनपुर की नवीन नगर कॉलोनी में श्री अशोक जैन "सिंहल"  अपने परिवार सहित रहते हैं । इनके इस नव-निर्मित आवासीय भवन का नाम है -  राज़ा साह रनवीर सिंह किला।  भवन के प्रवेश द्वार पर ही दो प्रहरियों की प्रतिमायें दिखाई देती हैं।  आगे बढ़ें तो दीवार पर एक विशाल घड़ी जिस पर लिखा है - शत्‌ शत्‌ नमन वंदन सहारनपुर संस्थापक राजा साह रनबीर सिंह ।  फिर इन्हीं शब्दों से सुसज्जित एक फ्लेक्स बोर्ड दिखाई देता है।  भवन स्वामी श्री अशोक जैन को अपना परिचय देता हूं,  आने का उद्देश्य बताता हूं तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता स्पष्ट दिखाई देती है।  बहुत जल्दी स्पष्ट होने लगता है कि श्री अशोक जैन को राजा साहरन वीर सिंह का वंशज होने पर बहुत गर्व है और उन्होंने इस ऐतिहासिक तथ्य को कि सहारनपुर के संस्थापक राजा साहरन बीर सिंह थे  जन-जन तक पहुंचाने को अपने जीवन का ध्येय बना लिया है।



विभिन्न स्रोतों से ऐतिहासिक प्रमाण एकत्र करने के प्रयास में उन्होंने दर-दर की खाक छानी है।  कुछ लोगों ने उनकी खिल्ली भी उड़ाई पर वह अपने लक्ष्य से विचलित कभी नहीं हुए।

श्री अशोक जैन "सिंहल"  ने सबसे पहले प्रमाण के रूप में वर्ष 1918 का एक दस्तावेज़ दिखाया जो खंडहर अवस्था में आ जाने के कारण अब लैमिनेट (laminate) करा लिया गया है।  दिल्ली डिस्ट्रिक्ट की इस दरबार सनद में राजा राम सिंह की वंशावली दिखाई गई है।  राजा राम सिंह के पुत्र सहारन सिंह का परिचय नाम के नीचे इस प्रकार दिया गया है - Founder of the Saharanpur City and a Jagirdar of the Akbar the Great).    इस वंशावली की जर्जर अवस्था को देखते हुए श्री अशोक जैन ने इसे एक अन्य कागज़ पर हिंदी में रूपांतरित करा लिया है।  






 सर्वे ऑफ इंडिया के सहारनपुर के नक्शे में  कहा गया है कि -  "The historical records bear out the fact that Saharanpur was founded by Raja Shah Ranveer."    पर इसके आगे लिखा गया है - "  The District Name has been derived from its principal city SAHARANPUR which has been derived from the Peer Shah Haroon.  यह विवरण भ्रम उत्पन्न करने वाला है।

सहारनपुर के मास्टर प्लान का जिक्र करते हुए श्री अशोक जैन ने एक मनोरंजक तथ्य का उल्लेख किया। सहारनपुर महायोजना की पुरानी पुस्तिका 1985-2001 में पृष्ठ 5 पर ऐतिहासिक विकास का जिक्र करते हुए लिखा गया था - " परम्परागत यह समझा जाता है कि नगर का नाम एक साधु के नाम पर पड़ा जिसका नाम "साह हिरन चिस्ती" था।  आज भी उनका मकबरा धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और सैंकड़ों मुसलमान यात्री प्रतिवर्ष यहां आते हैं।....."

सहारनपुर महायोजना २०२१, यानि कि इससे अगले अंक में यही बात कुछ इन शब्दों में कही गई - " नगर का नाम एक साधु के नाम पर पड़ा जिसका नाम "साह हिरन चिस्ती" था।  आज भी उनका मकबरा धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और  हज़ारों मुसलमान यात्री प्रतिवर्ष यहां आते हैं।....."     यहां यह उल्लेखनीय है कि "परम्परागत यह समझा जाता है कि "  वाक्यांश को हटा देने से एक लोक मान्यता को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में परिवर्तित करने की चेष्टा की गई थी।

इसके पश्चात्‌  महायोजना का अगला संस्करण प्रकाशित करने से पूर्व महायोजना पर जन सामान्य से आपत्तियां आमंत्रित की गईं।  राजा साहरन बीर सिंह के वंशज के नाते श्री अशोक जैन ने कुछ इतिहास वेत्ताओं के साथ
सहारनपुर विकास प्राधिकरण में आपत्ति दाखिल की।  इस आपत्ति का संज्ञान लेते हुए प्राधिकरण ने महायोजना पुस्तिका के अगले अंक में उक्त विवरण को हटा दिया। इस बारे में टिप्पणी में लिखा गया -  "आवेदक द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों के दृष्टिगत विवादित नाम का
उल्लेख न किये जाने तथा विवादित अंश को हटाने की संस्तुति की जाती है।"

उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रकाशित पुस्तिका में अब जो उल्लेख मिलता है वह इस प्रकार है -  "..... अकबर के समय में सहारनपुर नगर राजा साह रणवीर सिंह ने बसाया था।  अकबर ने इसे अपनी सरकार का मुख्यालय बनवाया और तभी से यह जनपद सहारनपुर के नाम से विख्यात है।"   

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