शनिवार, अगस्त 5

जो कुछ करते नहीं, मर जाते है - आचार्य प्रतिष्ठा शर्मा

सहारनपुर, वर्ष 1985 । लगभग दो वर्ष की आयु की बालिका। एक चींटे पर पैर आ गया और वह मर गया। पिता से बोली, ‘पापा, ये चींटा तो मर गया।’ पिता ने पूछा, ‘तुझे कैसे पता कि मर गया?’ बालिका का उत्तर था, ‘यह कुछ कर नहीं रहा। जो कुछ नहीं करते, वे मर जाते हैं।’
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नई दिल्ली, वर्ष 2001 आई सी सी आर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज के सम्मुख एक नृत्य साधिका कत्थक नृत्य प्रस्तुत कर रही है। नृत्यकला में निष्णात इस बालिका के नृत्य से चित्रखिंचित सी सुषमा स्वराज परिचय प्राप्त करने को उत्सुक हैं और उसके पास आ उसे देख कर कह उठती हैं - हे भगवान् । तुम तो अभी बहुत छोटी सी हो। इस आयु में ऐसी नृत्य साधना ?
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आइसलैंड, 29 मई 2005 । महामहिम राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के साथ भारत का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व कर रहीं भारत की पांच प्रख्यात नृत्यांगनायें व अन्य कलाकार आइसलैंड की राजधानी रिकजैविक में वहां के राष्ट्रपति के साथ बातचीत कर रहे हैं। आइसलैंड की प्रथम महिला सबसे कम आयु की प्रतीत होती इस नृत्यांगना को देख उससे उसकी आयु पूछती हैं। उनका विदेशी उच्चारण समझ न पाने के कारण इस युवती को असमंजस में खड़े देख भारत के राष्ट्रपति उसके पास आकर कान में फुसफुसाते हैं - ये तुमसे तुम्हारी आयु पूछ रही हैं!
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आइसलैंड, 31 मई 2005 । भारत और आइसलैंड के राष्ट्रपतियों की गरिमामयी उपस्थिति में यह नृत्य साधिका कत्थक नृत्य प्रस्तुति देकर तालियों की गड़गड़ाहट के मध्य मंच से उतरने का उपक्रम कर ही रही है कि ए पी जे भारत की ओर से दी गई इस नृत्य प्रस्तुति से इतने गर्वित व आह्लादित हैं कि इस नृत्य साधिका को हृदय से लगा लेते हैं। इसके बाद दोनों राष्ट्रपतियों के व उनके परिवार के साथ इस नृत्य साधिका का रात्रिभोज व अन्तरंग बातचीत का लम्बा सिलसिला चलता रहता है।
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क़तर,  अक्तूबर 2009  :  "अरे, हम तो इस प्रोग्राम का पता चलने पर यही सोच रहे थे कि कौन पागल होगा जो कत्थक देखने जायेगा ! पर फिर आपके बारे में इंटरनेट आदि पर भी पढ़ा और मन किया कि चलो, देख लेते हैं। नहीं अच्छा लगेगा तो उठ कर वापिस आ जायेंगे। पर आप तो अद्‌भुत हैं। यदि कत्थक वही सब कुछ है जो आपने प्रस्तुत किया है तो हमें आज से कत्थक भी पसन्द है! "
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जानना नहीं चाहेंगे - कौन है यह नृत्य साधिका जो शास्त्रीय नृत्य के आकाश पर जाज्वल्यमान नक्षत्र की भांति जगमगा रही है?  जापान, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, आइसलैंड और अब यमन, क़तर सहित तीन खाड़ी देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली यह नृत्यांगना व योग साधिका हमारे सहारनपुर के लिये निश्चय ही गौरव हैं।

आपके लिये हम लेकर आये हैं सहारनपुर की इस लब्धप्रतिष्ठ युवा नृत्यांगना व योग साधिका आचार्य प्रतिष्ठा शर्मा से एक विशेष बातचीत ।

आपको यह सूचना कब और कैसे मिली कि आपको खाड़ी देशों में जाकर कत्थक नृत्य की प्रस्तुतियां देनी हैं?

प्रतिष्ठा शर्मा : दर असल, मैं ICCR ( Indian Council for Cultural Relations - भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्‌) के द्वारा चयनित कलाकार हूं, बल्कि ICCR द्वारा चयन किये कलाकारों में संभवतः सबसे कम आयु की कलाकार हूं। यह परिषद्‌ देश के प्रतिष्ठित कलाकारों को विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रचार - प्रसार के लिये भेजा करती है और इसी निमित्त मैं भी विभिन्न देशों में जाती रही हूं। इस बार भी मुझे सूचित किया गया था कि मेरे लिये छः या सात देशों की यात्रा
का लगभग एक मास का कार्यक्रम बनाया जा रहा है। अपने पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों के कारण मुझे अपना कार्यक्रम संक्षिप्त कराना पड़ा और इस प्रकार तीन देशों का पन्द्रह दिन का टूर तय हुआ। अगस्त में जाने की बात थी किन्तु रमज़ान के मास के बाद जाना ज्यादा उपयुक्त लगा इसलिये अक्तूबर के लिये कार्यक्रम को अंतिम रूप दे दिया गया।

आपके साथ कौन - कौन कलाकार थे? क्या ये सब पूर्व परिचित ही थे?

प्रतिष्ठा शर्मा : यह एक सोलो पर्फारमेंस (एकल प्रस्तुति) थी जिसका दायित्व मेरे ही कंधों पर था। मैं अपने साथ चार सहयोगी कलाकार लेकर गई थी जो तबला, सारंगी, वोकल व कविता पाठ हेतु मेरे साथ रहते हैं।

क्या आम तौर पर ऐसे कार्यक्रमों में बहुत सारे कलाकार नहीं होते हैं? मुझे तो यही आभास था।

प्रतिष्ठा शर्मा : आम तौर पर ऐसा ही होता है कि विदेशों में आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों में बड़ा ग्रुप भेजा जाता है जिसमें कई कलाकारों को अपनी - अपनी प्रस्तुतियां देनी होती हैं। ICCR के पैनल पर ऐसे कलाकार गिने-चुने ही हैं जिनको अकेले भी भेजा जाता है। चूंकि मैं भी उनमें से एक हूं अतः कार्यक्रम की सफलता व अननन्तर अपने देश के सम्मान को अक्षुण्ण रखने का मेरा दायित्व और भी बढ़ जाता है।

खाड़ी देशों में आपके इससे पूर्व भी कार्यक्रम आयोजित किये गये हैं या पहली बार ही ....?

प्रतिष्ठा शर्मा : नहीं, खाड़ी देशों की यात्रा का यह पहला ही सुअवसर था और मैने इसका पूर्ण आनन्द लिया। जापान, इंडोनिशिया, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, इंग्लैंड, सिंगापुर आदि जाने का तो अवसर मिला था पर इस दिशा में पहली बार ही निकली थी।

जब इतना अधिक आना-जाना लगा रहता है तो ज्यादा तैयारियां तो नहीं करनी पड़ती होंगी ? 

प्रतिष्ठा शर्मा : (खिलखिलाते हुए)  अब आप ही सोचिये कि मैं नारी हूं तो भारी भरकम सामान लिये बिना,  जोर-शोर से तैयारियां किये बिना घर से कैसे विदेश यात्रा पर निकल सकती हूं ?  कई सारी नई-नई वेषभूषाएं सहारनपुर जाकर तैयार कराईं। जी हां, ठीक सुना आपने!   मुझे अपने कपड़े सहारनपुर में ही सिलाने में संतोष होता है। दो जोड़ी घुंघरू खरीदे ताकि एक खराब हो जाने पर भी काम न रुके। इसी प्रकार तबला वादक ने भी दो जोड़ी तबले साथ लिये। हम कलाकारों का सामान ऐसा होता है जो कस्टम अधिकारियों की समझ में नहीं आता अतः वे उसे खोल-खोल कर जांच पड़ताल करते हैं । पर भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम पर भेजे जाने के कारण हमें व्हाइट पासपोर्ट दिया जाता है जो हमें अति विशिष्ट मेहमान की श्रेणी में ला बैठाता है। अतः किसी भी कस्टम पर हमें उन परेशानियों से नहीं गुज़रना पड़ता जिनके लिये कस्टम जाना जाता है।

हां, इतना अवश्य है कि मेरी तैयारियों का एक बड़ा हिस्सा मेरा भोजन होता है। पूर्णतः शाकाहारी होने के कारण मैं बनाये जाने के लिये लगभग तैयार (ready to cook) भोजन अपने साथ लेकर चलती हूं। यह एक विशेष तैयारी कही जा सकती है। इस बार गल्फ जाना था तो मुझे लगा कि शाकाहारी भोजन वहां दुर्लभ ही रहेगा अतः थोड़ा ज्यादा इंतज़ाम कर लिया था।

अपनी प्रस्तुतियों के लिये आपने क्या थीम चुनी थी और क्या इसका कोई विशेष उद्देश्य भी था? आपको ICCR में कुछ बताया तो गया होगा कि खाड़ी देशों की जनता किस प्रकार की प्रस्तुतियां देखना चाहेगी!


प्रतिष्ठा शर्मा : नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं बताया गया था पर हां, इतना तो मुझे ज्ञात ही था कि वहां के लोग ग़ज़ल आदि के दीवाने हैं। पर मेरी थीम थी - "Dance with Divine" क्योंकि मुझे वहां भेजे जाने का उद्देश्य ही भारतीय संस्कृति से विश्व भर को परिचित कराना था। जिस प्रकार की प्रस्तुतियां वहां की जनता देखती ही रहती है, मैं भी वही प्रस्तुतियां दे आऊं तो मेरा जाना निरर्थक ही हो जायेगा, यही सोच कर मैने हिम्मत की और Dance with Divine शीर्षक से अपना कार्यक्रम तैयार किया। कत्थक की यह विशेषता ही है कि हम विभिन्न लोककथाओं, आध्यात्मिक महापुरुषों आदि के जीवन-चरित आदि को नृत्य के माध्यम से मंच पर जीवन्त कर सकते हैं। नृत्य का अर्थ शरीर को कुछ विशेष रीति से हिलाना-डुलाना नहीं है। नृत्य के माध्यम से हम कहानी कह सकते हैं अतः मैने भी भारतीय वांग्मय में से कुछ कहानियों का चयन किया था। जो थीम वहां प्रचार सामग्री में प्रकाशित की गई थी, वह भी यही थी। प्रभुकृपा एवं गुरुजनों के आशीष से इन प्रस्तुतियों को भरपूर सराहना भी मिली ।


क्या आपके दर्शक आपसे पूर्व परिचित थे ?

प्रतिष्ठा शर्मा : प्रत्यक्ष रूप में तो नहीं, पर आज इंटरनेट की कृपा से दुनिया एक गांव बन गई लगती है। मेरा प्रोफाइल तो प्रचार सामग्री के साथ प्रकाशित हुआ ही था। कुछ लोग ऐसे भी मिले जो ज़ी नेटवर्क पर मेरे योग के कार्यक्रम देखते रहते हैं।

कई बार प्रस्तुतियों के बाद मेरे पास आकर कहते थे, "अरे, हम तो इस प्रोग्राम का पता चलने पर यही सोच रहे थे कि कौन पागल होगा जो कत्थक देखने जायेगा ! पर फिर आपके बारे में इंटरनेट आदि पर भी पढ़ा और मन किया कि चलो, देख लेते हैं। नहीं अच्छा लगेगा तो उठ कर वापिस आ जायेंगे। पर आप तो अद्‌भुत हैं। यदि कत्थक वही सब कुछ है जो आपने प्रस्तुत किया है तो हमें आज से कत्थक भी पसन्द है! " इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं स्थान - स्थान से मिलती रहीं तो मैने प्रभु को धन्यवाद दिया कि मेरे देश ने मुझे जिस कार्य के लिये भेजा था, वह करने में सफलता मिल रही है।

कुल मिला कर कितने शो हुए ?

प्रतिष्ठा शर्मा : तीनों देशों में कुल मिला कर सात कार्यक्रमों का आयोजन रहा ।

खाड़ी देशों में आपको अपने दर्शकों से संवाद स्थापित करने में कोई कठिनाई तो नहीं आई?

प्रतिष्ठा शर्मा : सिर्फ यमन के दर्शकों को अंग्रेज़ी समझने में थोड़ी दिक्कत थी वरना अंग्रेज़ी सभी जगह संपर्क भाषा बनी रही और कोई भी कठिनाई नहीं आई । क़तर में तो अंग्रेज़ी से भी ज्यादा हिन्दी लोकप्रिय थी जो मेरे लिये सुखद आश्चर्य था।

यमन में मैं बहुत ही सरल अंग्रेज़ी में दर्शकों को संबोधित करती रही व अरबी भाषा के कुछ प्रचलित शब्द भी सीख लिये थे जैसे क़ैफ़ हलक, तमाम, शुकरान । और हां, अरब का एक बहुत लोकप्रिय लोकगीत भी मैने तैयार कर रखा था। मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती कि अपनी प्रस्तुति के समापन के लिये इस अरबी लोकगीत को प्रस्तुत करने के बाद वहां की जनता ने कितने आह्लादकारी ढंग से मेरा स्वागत और सम्मान किया। बहुत देर तक लोग खड़े होकर ताली बजाते रहे।

कार्यक्रम आरंभ करते समय परिचय सत्र में ही मैने दर्शकों से निवेदन किया था कि - भाषा की समस्या हमारे बीच में है जरूर पर संवेदनाओं की अपनी भाषा है जो सर्वव्यापक है। उसे समझने के लिये न तो हिन्दी चाहिये, न अंग्रेज़ी और न ही अरबी । आज हम संवेदनाओं की, नव रसों की भाषा में ही बात करेंगे, नृत्य की भाषा में बात करेंगे और मुझे उम्मीद है कि इस भाषा को आप सहज ही समझ जायेंगे और आनंद ले सकेंगे।

इस यात्रा के कुछ स्मरणीय पल संजो कर लाने का आपने वायदा किया था.... ? कुछ चित्र लाई हैं अपने साथ ?

प्रतिष्ठा शर्मा : मुझे आपसे किया गया अपना वायदा पूरी तरह याद है। वीडियो रिकॉर्डिंग्स तो मुझे नहीं मिल सकीं, हां, कुछ चित्र अवश्य हैं जो आप द सहारनपुर डॉट कॉम के पाठकों के साथ बांट सकते हैं। बहुत अच्छी स्मृतियां हैं, बहुत अच्छे लोग हमें वहां मिले। यमन में मेरे देश का प्रतिनिधित्व कर रहे राजदूत श्री प्रवीण वर्मा, यमन के भारतीय दूतावास में First Secretary श्री महेन्द्र खुराना चार दिन तक निरंतर हमारा साथ निभाते रहे। उनकी इस आतिथ्य भावना से मैं अभिभूत हूं। इन भारतीय अधिकारियों के अतिरिक्त यमन के सांस्कृतिक मंत्री भी हर शो में उपस्थित रहे, ये सब उच्चाधिकारी हमारी कितनी चिंता कर रहे हैं, हर सुख-सुविधा की व्यवस्था में लगे हुए हैं, यह देख कर बहुत अच्छा लगा । उनको कोटि-कोटि साधुवाद !

क़तार में तो घर यानि, अपने देश जैसा ही माहौल अनुभव होता रहा और इसका श्रेय है इंडियन कल्चर सैंटर को। उन्होंने हमारे लिये हर संभव व्यवस्था कर रखी थीं ताकि हमें कोई भी कष्ट न हो।

खाड़ी देशों में जाने हेतु पुनः जाने का निमंत्रण मिले तो जाना चाहेंगी?

प्रतिष्ठा शर्मा : क्यों नहीं ? जिन देशों की जनता से इतना अपनापन, प्यार और सम्मान मिला हो, वहां कौन कलाकार दोबारा नहीं जाना चाहेगा ? मेरी विभिन्न प्रस्तुतियां - माखनचोरी, पनिहारन और रामायण को वहां के दर्शक बड़े सहज ढंग से समझ पारहे थे। मुझे लगता है कि इसका कारण शायद यही रहा होगा कि उनकी जड़ें कहीं बहुत गहरे में ही सही, भारतीय संस्कृति से जा मिली हैं। भाषा अलग है, बोली अलग है, वेषभूषा अलग है, धर्म अलग है पर सांस्कृतिक धरातल पर कहीं न कहीं, कुछ न कुछ साम्य अवश्य है। अमेरिका के लोग, इंग्लैंड के लोग सांस्कृतिक धरातल पर हमसे काफी अलग हैं पर खाड़ी के बारे में मुझे ऐसा नहीं लगा। अतः उनसे एक जुड़ाव अनुभव करने लगी हूं और उन लोगों से भेंट का अवसर दिया, अपनी बात, अपनी संस्कृति उनके साथ बांट पाई, इसके लिये अपनी भारत सरकार, ICCR के प्रति आभारी हूं।


- संपादक

The Saharanpur Dot Com

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