शनिवार, अगस्त 5

माफ करना सर... !

"माफ करना सर"

‘‘सर ! एक बूढ़ा आदमी आपसे मिलना चाहता है।’’ राजेन्द्र शर्मा, गार्ड ने आकर बताया।

‘‘कौन है ?’’

’‘पता नहीं सर कौन है ?‘’ बड़ा गरीब लगता है।

’‘क्या काम है?’‘, कुछ बताया क्या ?

’‘नहीं सर , बस आपसे मिलने के लिए कह रहा है, अन्दर भेज दूँ क्या‘’ ? गार्ड़ ने अनुमति लेनी चाही।

’’ठीक है, भेज दो।‘‘




वह आदमी गार्ड़ के साथ अन्दर आया, बाबू जी कहकर उसने दोनों हाथ जोड़ दिए। रवि ने नमस्ते कहते हुए उसे बैठने के लिए कहा। आम तौर पर पी. डब्ल्यू. डी. के कर्मचारी रवि से मिलने आते ही रहते थे जिनमें ज्यादातर उसके पिता जी के संदर्भ से अपने लोन आदि के मामलों की बात उससे कहते। आपको यह बताते चलें कि रवि के पिता जी भी पी.डब्ल्यू. डी. से रिटायर हैं और पी. डब्ल्यू. डी. के सभी कर्मचारियों के वेतन का संवितरण उसकी शाखा के माध्यम से ही होता है, इसलिए वे उस पर एक तरह से अपना अधिकार भी समझते हैं और रवि का भी सदैव यही प्रयास रहता कि जहाँ तक सम्भव हो उनकी मदद कर सके। रवि ने ये संस्कार अपने पिताजी से ही विरासत में पाये हैं।


रवि को दो दिन बाद सरकारी काम के लिए मेरठ जाना था, इसलिए कम्प्यूटर पर काम करते-करते उसने कहा ’‘बताओ बाबा क्या काम है’’ ? ’‘आप अपना काम निपटा लें हुजूर, तो बताऊँ‘’ बूढ़े ने कहा। इस बार रवि ने उस व्यक्ति को बड़े ध्यान से देखा, उसकी आयु लगभग 60-62 वर्ष की रही होगी, बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी, पिचके हुए गाल और कन्धे पर चादरनुमा फटा सा एक कपड़ा था। ’‘हाँ बताइए‘’ रवि ने कम्प्यूटर से अपना ध्यान हटाते हुए कहा।


वह आदमी बिना किसी भूमिका के बोला ‘‘साहब क्या बताऊँ ? दिल्ली के एक हस्पताल में मेरा इकलौता बेटा मौत से जूझ रहा है, मेरे पास जो भी जमा पूँजी थी उसके इलाज में झोंक दी, सिर छिपाने के लिए गाँव में एक झोंपड़ा है, सोचा था उसे बेचकर ही बेटे की जान बचा लूँगा पर गाँव भर में कोई खरीदने वाला ही नहीं है। बड़ी हेठी किस्मत लेकर आया है अभागा। साहब ! डाक्टर ने बीस हजार में मेरे बेटे की जान बचाने की बात कही है घर की टूम-टाम बेचकर दस हजार तो इक्ट्ठे हो गए हैं, आप किसी भी तरह मुझे दस हजार रुपए दे दें तो शायद आपके भाग से ही मेरे बेटे की जान बच जाए। बाबू जी! मैं बड़ी आस लेकर आपके पास आया हूँ दया करके मेरे बेटे की जान बचा लो!’’ कहता हुआ रवि की ओर बढ़ा और उसके पैर छूने की कोशिश की ।

रवि ने उसे रोकते हुए बड़ी मुश्किल से संभालकर सोफे पर बैठाया। उसकी आँखें डबडबा आयी थीं। ’‘बाबा! मैं तो आपको जानता तक नहीं, ऊपर से मैं भी एक नौकरी पेशा आदमी ही तो हूँ, हाँ हजार-पाँच सौ की बात होती तो एक बार सोचता भी, इतने पैसे तो मेरे पास नहीं हैं, कहकर रवि ने पीछा छुड़ाने की कोशिश । बूढ़ा फिर से गिड़गिड़ाने लगा, वह उसे आस-औलाद और न जाने किस-किस बात की दुहाई दे रहा था, तभी स्कूल के जमाने की एक घटना चलचित्र की भाँति रवि की आँखों के सामने तैरने लगी।

इण्टरमीडिएट की परीक्षाएं दे कर उसे एक दिन अपने अन्य मित्रों के साथ बैंक में कलर्क की परीक्षा देने के लिए चण्डीगढ़ जाना था। अभी वे लोग स्टेशन पहुँचे ही थे कि एक बूढ़ा आदमी रोता हुआ उनके पास आया और उनसे बताया कि कालका में उसके जवान बेटे का निधन हो गया है, और उसके पास कालका जाने के लिए किराए तक के पैसे नहीं हैं, उसने कहा कि अगर उसे बीस रुपए मिल जाएं तो वह बेटे की मिट्टी को कंधा दे सकता है।
बूढ़े की बातें जाने क्यूँ रवि को सच्ची सी लगी और उसके मन में बूढ़े की मदद करने की ललक जाग उठी। इस ललक के पीछे शायद यह भावना अधिक बलवती रही होगी कि वे लोग यदि बूढ़े की मदद करेंगें तो शायद भगवान उनके इस अच्छे काम से और बूढ़े के आशीर्वाद से खुश हो जाएं और उन्हें नौकरी मिल ही जाए। ऐसी स्वार्थ री भावना से उसने अपने दोस्तों को उसकी मदद करने के लिए तैयार किया। उन दिनों उनमें से कोई भी मित्र इतना सक्षम नहीं था कि दस-बीस रुपए उसे अकेले ही दे देता। उन सबने मिलकर किसी प्रकार से बीस रुपए इकट्ठे करके उसे दे दिए। चूँकि रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई थी, इसलिए उन्होंने बूढ़े से कहा कि वह टिकट लेकर आ जाए और हम उसके लिए सीट रोक कर रखते हैं और वे सारे गाड़ी में बैठ गए। बूढ़े के लिए उन्होंने सीट रोक कर रखी। गाड़ी चल पड़ी, लेकिन वह बूढ़ा नहीं आया। उन्होंने सोचा कि वह किसी अन्य डिब्बे में बैठ गया होगा। रवि मन ही मन बड़ा प्रसन्न था कि घर से चलते ही हमने एक पुनीत कार्य किया है जिसके परिणामस्वरूप परीक्षा में सफलता जरूर मिलेगी और बैंक की नौकरी तो पक्की ही समझो। दो महीने का ग्रीष्मावकाश टैस्ट देते-देते न जाने कब समाप्त हो गया। इण्टरमीडिएट की परीक्षा के परिणाम भी आ गए थे और उसके सभी मित्र अच्छे अंकों से पास हो गए थे। उन सभी ने महाराज सिंह कालेज में प्रवेश ले लिया। उनकी सभी कक्षाएं प्रायः दस बजे तक समाप्त हो जाती थीं और छुट्टी के बाद वे सभी मिलकर गेट के पास सक्सेना जी की चाय की दुकान पर कभी-कभार समोसे खाने चले जाते थे।

एक दिन छुट्टी के बाद वे कालेज के बाहर आ रहे थे तो उन्होंने देखा कि गेट पर छात्रों का समूह इस प्रकार इकट्ठा था जैसे कि कोई मदारी तमाशा दिखा रहा हो। उत्सुकतावश उन्होंने भी झाँक कर देखा, लेकिन उस समय उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि वही स्टेशन वाला बूढ़ा बेटे की मौत की वही पुरानी कहानी सुना कर लड़कों से मदद माँग रहा है। इस अप्रत्याशित घटना से उनका खून खौल उठा, भीड़ को चीरते हुए रवि उसके पास जा पहुँचा और उसे पकड़ कर पूछा कि तुम्हारा इकलौता बेटा तो दो महीने पहले कालका में मर गया था, अब मरने के लिए यह बेटा कहाँ से पैदा हो गया ? इसी बीच उसके अन्य मित्र भी अन्दर घेरे में आ गए, बूढ़े ने उन सब को पहचान लिया और वहाँ से खिसकने लगा, तो अखिल ने उसे पकड़ लिया। पास खड़े अन्य लड़के भी मामले को भाँप गए, फिर क्या था ? राजकुमार धारीवाल, सुरेन्द्र कुमार, के.पी. सिंह आदि सभी उसे मारने के लिए उस पर टूट पड़े। रवि ने उन्हें यह कह कर बड़ी मुश्किल से रोका कि बूढ़ा आदमी है, कहीं मर-मरा गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। सब लड़कों ने मिलकर उसकी तलाशी ली तो कुल मिलाकर बावन रुपए उसकी जेबों से मिले। लड़कों ने रुपए छीन कर उसे यह चेतावनी देते हुए दौड़ा दिया कि यदि यह नाटक करते हुए दोबारा सहारनपुर में मिल गया तो बहुत मार पडे़गी। बूढ़ा जान बचाकर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गया और सब लड़कों ने मिल कर बावन रुपए के चाय समोसे उड़ाए।

विचारों में लीन रवि अभी उन समोसों के स्वाद का आनन्द ले ही रहा था कि उस आदमी ने उसका कन्धा हिला कर कहा ’‘कहाँ खो गए हो बाबू जी, मुझ पर दया करो, मैं आपके इस उपकार को कभी नहीं भूलूँगा। बाबू जी, मैं आपसे यह पैसा उधार माँग रहा हूँ, इसके लिए आप चाहें तो मेरा झोंपड़ा अपने नाम लिखवा लें। मेरा बेटा एक बार ठीक हो जाए तो मैं और मेरा बेटा दोनों अपनी चमड़ी बेचकर भी आपका पैसा लौटाएंगे बाबू जी।’‘
पैसा लौटाने की बात सुन कर रवि को अनायास ही मालती की याद आ गयी, वह भी तो यही कह कर गयी थी ना, कि ’‘I am an educated lady sir, I will return all your money immediately after reaching my native place....."

रवि को लगा कि निश्चित रुप से यह पुरानी घटनाओं की पुनरावृत्ति ही है। रवि के मन में बूढ़े के प्रति सहानुभूति की भावना अब समाप्त हो चुकी थी। बूढ़े का गिड़गिड़ाना रवि की चिड़चिड़ाहट को बढ़ा रहा था, बूढ़े की विनयपूर्वक मदद की गुहार पर अब उसे क्रोध आने लगा। रेलवे स्टेशन वाला बूढ़ा, फिर मालती, और अब एक बार फिर वही, उसने मन ही मन निश्चय किया कि इस बार तो कम से कम वह बेवकूफ नहीं बनेगा और अपनी झल्लाहट उस बूढ़े पर निकालते हुए उस पर बरस पड़े ‘‘क्या मैं ही एक बेवकूफ रह गया हूँ दुनिया भर में ? अरबों लोगों का देश है ये, मैं ही एक धर्मात्मा तो नहीं बचा धरती पर, जाओ अपनी दुःख भरी कहानी किसी और को सुनाना, मेरे पास कोई पैसे वैसे नहीं हैं।’’ अभी वह बड़बड़ा ही रहा था कि गार्ड अन्दर आ गया और बोला ‘‘साहब क्या हो गया ?’’ रवि ने आव देखा न ताव, राजेद्र गार्ड को भी खूब लताड़ा ’ले जाओ इस बूढ़े को मेरे पास से, तुम ही लाए हो न इसे मेरे पास, तुम्हें यह बहुत गरीब लगता है ना, तो तुम ही क्यों नहीं दे देते इसे दस हजार रुपये ? मुझे नहीं चाहिए इसके आशीष, नहीं बनना मुझे धर्मात्मा, तुम्हारी तरह ही मालती को भी वो जैन का बच्चा लाया था मेरे पास, और अबला कह कर दिलवा दिए थे पच्चीस सौ रुपये कि घर जाकर वापस कर देगी। चार साल हो गए हैं, मेरे पैसे आज तक आए क्या ? सब चोर हैं।‘‘

रवि का यह रूप देख कर वह बूढ़ा भी सहम गया। राजेन्द्र गार्ड उस बूढ़े को तुरन्त बाहर ले गया। थोड़ी देर बाद पानी का गिलास लेकर राजेन्द्र गार्ड़ फिर केबिन में आया ’’साहब पानी पीओ’‘ कहकर पानी का गिलास उसने रवि की ओर बढ़ा दिया। रवि ने पानी पी लिया तो गार्ड ने कहा ‘’साहब! शायद मुझसे कुछ गलती हो गयी है मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ, पर साहब ये मालती कौन थी ?’’ रवि ने गार्ड से यह कहकर कि मालती कोई नहीं थी, टालने की कोशिश की। ’‘सर कोई बात तो जरूर है जिससे आप इतने आहत हैं, मैंने आपको इतना नाराज होते हुए पहले कभी नहीं देखा। आखिर कौन थी मालती और क्या किया था उसने ?’’ राजेन्द्र ने दोबारा पूछना चाहा। रवि ने गार्ड को सारी घटना सुनाई।

’’एक दिन आर.के.जैन यहाँ के सहायक प्रबन्धक ने मुझे फोन करके बताया कि एक महिला जो मद्रासी लगती है, ब्रांच में बैठी है, उसके साथ छोटे-छोटे दो बच्चे भी हैं और बीमार लगते हैं। जैन उसके बारे में बता ही रहा था कि उस महिला ने जैन से फोन का चोंगा ले लिया तथा अपना परिचय मालती के रुप में देते हुए मुझे बताया कि वह सहारनपुर में अपने किसी रिश्तेदार से मिलने आई थी जो इसी बीच किसी अन्य रिश्तेदार की मृत्यु होने के कारण दिल्ली चले गए हैं। मालती ने मुझे बताया कि वह केरल के पालघाट की रहने वाली एक सम्भ्रान्त परिवार की पढ़ी लिखी महिला है।

उसकी फर्राटेदार अंग्रेजी और बातचीत से मुझे भी लगा कि वह किसी अच्छे परिवार से ही थी। बातों ही बातों में उसने मुझे बताया कि रास्ते में उसके बच्चे बीमार हो गए और जो नकदी वह अपने घर से लेकर चली थी बच्चों की दवादारु में खर्च हो गयी और अब न तो उसके पास पैसे हैं न ही कहीं ठहरने के लिए जगह। उसने मुझसे वापस जाने के लिए किराए की व्यवस्था करने का अनुरोध कर कहा कि मैं उसे पच्चीस सौ रुपए दे दूँ, ताकि वह अपने बच्चों को लेकर अपने घर सकुशल पहुँच जाए। अपने घर वापस जाने पर पैसे लौटाने का भरोसा भी उसने दिलाया।

उसकी बातें सुनकर मेरे दिल और दिमाग में द्वन्द्व छिड़ गया। दिल मुझे उसकी मदद करने के लिए कहता कि परदेश में एक अबला स्त्री, साथ में बीमार बच्चे, जो न यहाँ की भाषा जानती है न उसका कोई सगा ही यहाँ है, लेकिन दिमाग कहता कि निश्चित रूप से यह कोई ठग है, इतनी दूर से भला कोई स्त्री छोटे-छोटे बच्चों को लेकर अकेली क्यों आने लगी, दिल फिर कहता कि बीमार बच्चे साथ में हैं यह ठग नहीं हो सकती। दिल और दिमाग की इस जंग में दिल ने कहा कि संकट की इस घड़ी में यदि इस स्त्री की मदद न की गयी और ईश्वर न करे कि इनके साथ कोई हादसा हो गया, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा ? ऐसी स्थिति में ईश्वर उसे कभी माफ नहीं करेंगे, वैसे भी कहने को पच्चीस सौ रुपए होते ही क्या हैं? इस प्रकार द्वन्द्व में दिल जीत गया और मैंने आर.के.जैन से कहा कि उसका नाम, पता, फोन नम्बर आदि लेकर उसको पैसा दे दे। आर. के. जैन ने मेरे कहे अनुसार उसे पच्चीस सौ रुपए दे दिए।

कई हफ्ते बीत गए, मालती का न कोई फोन आया न पत्र। एक दिन मैं अपनी टेबल की ड्रायर साफ कर रहा था कि मालती का पता लिखी पर्ची मेरे हाथ लग गई, पर्ची पर लिखे फोन नं. पर मैंने बात की तो मेरे होश उड़ गए। फोन पर एक महिला ने मुझे बताया कि मालती नाम की एक महिला कोई पाँच-छह वर्ष पहले उनके यहाँ किराए पर रहती थी। जो हुलिया उस महिला ने बताया वह मालती से हू-ब-हू मिलता था। चौंकाने वाली बात यह पता चली कि उसने वही नाम पता देकर न जाने उसने कितनों का मूर्ख बनाया।’’ उसी दिन से मैंने किसी की मदद न करने की कसम खायी।‘‘

मालती की कहानी सुनकर राजेन्द्र शर्मा ने भी लम्बी ली और बोला ‘’बड़े कमाल की बात है साहब, एक औरत ने ये सब किया, क्या होगा इस दुनिया का ? ऐसे में तो आदमी का एक दूसरे पर से भरोसा ही उठ जाएगा।’’ कहकर वह केबिन से बाहर चला गया और मैं फिर से कम्प्यूटर पर अपना डाटा तैयार करने में लग गया।

कई महीनों के बाद एक दिन फिर वही बूढ़ा रवि को केबिन के बाहर गार्ड से बातचीत करता नजर आया। उसके हाव भाव से रवि को लगा कि वह उससे मिलना चाहता है। उसे देखकर रवि का मन कई प्रकार की आशंकाओं से घिर गया। उसके मन में रह-रह कर एक ही प्रश्न कौंधता कि यह बूढ़ा आज किसलिए आया है ? कहीं इसका बेटा वास्तव में ही बीमार तो नहीं था! रवि का माथा ठनका। अरे! कहीं इसका बेटा ............नहीं-नहीं, ईश्वर इतना निष्ठुर नहीं हो सकता। रवि इसी उहापोह में खोया था कि गार्ड केबिन का दरवाजा खोल कर बूढ़े के साथ अन्दर आ गया, उसे देखकर रवि की सांसें तेज हो गयी, वह अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए उससे कुछ पूछता, बूढ़े ने केबिन के बाहर झाँकते हुए एक नौजवान को अन्दर बुलाकर उसे कहा ‘‘अरे अन्दर आजा, और बाबू जी के पैर छूकर आशीर्वाद ले, अगर ये बाबू जी दया न करते तो आज तू न होता, मैंने कहा था न बाबू जी कि मेरा बेटा ठीक हो जाएगा तो अपनी चमड़ी बेच कर भी आपके पैसे लौटाऊँगा, बाबू जी मैं सारी उम्र आपका यह एहसान नहीं भूलूँगा। ’’वह न जाने कितने आशीष देता रहा, तभी वह नौजवान पैर छूने के लिए रवि की ओर बढ़ा, रवि उसे रोकता, उससे पहले बूढ़ा अपने काँपते हाथों में सौ-सौ के नोटों की एक गड्डी लिए मेज के पास आ गया। रवि हतप्रभ सा कभी नौजवान को देखता तो कभी उस बूढ़े के हाथ में नोटों की गड्डी को।

इसी बीच राजेन्द्र शर्मा, रुपए रखने के लिए कहकर बाप-बेटे को बाहर ले गया। गार्ड़ ने वापस आकर बताया ‘‘साहब ! जब आपने इस बूढ़े को रुपए देने से मना कर दिया था, मैं इसका दुःख सहन नहीं कर पाया, तब मैंने इसे ये रुपए उधार ला कर दिए थे और इससे कह दिया था कि बाबू जी बाहर से जितने कठोर हैं दिल के उतने ही दयालु हैं, ये रुपए साहब ने ही अपने घर से मँगाकर तुम्हें देने के लिए कहा है।’’

‘‘मेरे इस झूठ के लिए मुझे माफ करना सर!"

- कश्मीर सिंह 
सहायक महाप्रबंधक,
इंडियन ओवरसीज़ बैंक, पटियाला

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

जो विशेष पसन्द किये गये !