शनिवार, अगस्त 5

लेती नहीं दवाई अम्मा



’लेती नहीं दवाई अम्मा’  ग़ज़ल  एक कभी खत्म न होने वाला, वैश्विक धरातल पर विस्तार ले रहा  अभियान बनती जा रही है। जिस किसी को देखो,  अपनी अम्मा की छवि कागज़ पर उतारने में लगा है।  आइये देखें, किस - किस ने क्या-क्या लिखा है। यदि आप अभी तक चुप बैठे हैं तो कागज़ - कलम उठाइये (अर्थात्‌ कंप्यूटर या मोबाइल के की-बोर्ड पर उंगलियां ठकठकाये) और ई-मेल / व्हाट्स एप कर भेज दीजिये अपनी कविता हमें।

इस अभियान की शुरुआत कैसे हुई ?   हुआ यूं कि कुछ वर्ष पूर्व स्व.  प्रो. योगेश छिब्बर ने कुछ पंक्तियां मुझे  रात को ११ बजे एस.एम.एस. कीं !  जो पंक्तियां उन्होंने मुझे भेजी थीं, वह ये  रहीं -

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।
दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा ।
इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा ।
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा ।
बाबू जी तो तनख़ा लाये
लेकिन बरक़त लाई अम्मा।
बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा।
बाबूजी के पांव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा।
नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा।
सभी साड़ियां छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा।
अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा ।
अलग हो गये घर में चूल्हे
देती रही दुहाई अम्मा ।
बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा ।
रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा ।
लड़ते-सहते, लड़ते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा।
बेटी की ससुराल रहे खुश
सब ज़ेवर दे आई अम्मा।
अम्मा से घर, घर लगता है
घर में घुली, समाई अम्मा ।
बेटे की कुर्सी है ऊंची,
पर उसकी ऊंचाई अम्मा ।
दर्द बड़ा हो या छोटा हो
याद हमेशा आई अम्मा।
घर के शगुन सभी अम्मा से,
है घर की शहनाई अम्मा ।
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई अम्मा ।


Tribute to Mother : A Poem Recital by Sh. Yogesh Chhibber

हम आपसे आह्वान करते हैं कि हम सब अपनी अम्मा के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए कुछ पंक्तियां लिखें और इस गीत को आगे बढ़ायें। गीत, ग़ज़ल और कवितायें लिखना अपने बूते की बात नहीं पर जब मैने अपनी अम्मा की छवि सामने रख कर गुनगुनाना शुरु किया तो कुछ पंक्तियां कागज़ पर उतर आईं।

मेरी अम्मा, तेरी अम्मा
याद आज आई है अम्मा !
गुस्सा तो बस झूठ-मूठ का
सच में कब गरमाई अम्मा ।
बना-खिला कर खुश हो रहती
आधे पेट अघाई अम्मा ।
बाबूजी जब गुस्सा करते
बन जाती ठंडाई अम्मा ।
कैसे - कैसे कष्ट उठाये
दुःखी नज़र ना आई अम्मा ।
दुनियां से तो चली गई, पर
सपने में कल आई अम्मा ।
मेरे दुःख में रोया करती,
मेरी हंसी हंसाई अम्मा ।
कैसे खोजूं, कहां पे ढूंढूं
याद बहुत तू आई  अम्मा ।
- सुशान्त सिंहल

इस अभियान की जानकारी जैसे - जैसे द सहारनपुर डॉट कॉम के सुधी पाठकों को हो रही है,  सभी बहुत उत्साहित हैं और SMS या ई-मेल द्वारा गीत हमें लिख-लिख कर भेज रहे हैं। हर दो-तीन घंटे में मोबाइल की टिक-टिक होती है और देखो तो एक और नया गीत हाजिर !!   धन्य हैं मित्रों,   कुछ गीत काव्य-शिल्प की दृष्टि से यदि उन्नीस भी ठहरते हों तो उससे क्या होता है ?   हम सब गीतकार बनते जा रहे हैं, ग़ज़ल कहना सीख रहे हैं - ऐसा सृजनात्मक आंदोलन किसी वेब पोर्टल ने छेड़ा हो, याद नहीं पड़ता । हमें प्राप्त हुए कुछ गीत यहां प्रस्तुत हैं।
दर्द छुपाये, पर मुझे हंसाये,
ऐसी मेरी प्यारी अम्मा।
गम आये या खुशी छा जाये
हर पल सबसे न्यारी अम्मा।
कई गर्दिशें आईं ज़िन्दगी में
पर न हिम्मत हारी अम्मा।
तेरे आंचल में गुज़रे ये ज़िन्दगी
यही दुआ है हमारी अम्मा !

- चन्द्र शेखर शर्मा
विश्वकर्मा नगर, निकट एस.पी.एस. इंटर कॉलेज,
सहारनपुर


क्योंकि तू मेरी माँ है।
तू कितनी अच्छी है
तू कितनी सच्ची है
तू कितनी भोली है
क्योंकि तू मेरी माँ है।

     तेरा आँचल फैले ऐसा - जैसे अनन्त आकाश
     तेरी दुआएं ऐसी जैसे हिमगीरी विशाल
    तेरी सहनशीलता ऐसी जैसे धरती का फैलाव
    तेरा प्यार दुलार ऐसा जैसे पावन गंगा जल
क्योंकि तू मेरी माँ है।

बचपन में वो खेलकूद कर तेरे आँचल में छुप जाना
तेरा ममता भरे हाथों से वो मुझको सहलाना
गोद में तेरी लेट कर सुनना लोरी प्यारी
तेरी स्निग्ध मुस्कान हरती मेरी पीड़ा सारी
क्योंकि तू मेरी माँ है।

     निर्भय निडर होकर जीने का पाठ पढ़ाया
     मानव सेवा का भाव मन में तूने जगाया
     तेरी सिखायी राहों पर ही नित चलती हूँ  
    तेरे सीखों से जीवन में रंगों को भरती हूं।
क्योंकि तू मेरी माँ है।

- श्रीमती मंजू गोयल
2/ 1437/20 प्रद्युम्न नगर
निकट जैन डिग्री कॉलेज,
सहारनपुर 247001


कहने से पहले ही ,
मन के भावों को पढ़ लेती अम्मा
रहें स्वस्थ व सुखी हम सदा
यही दुआ करती है अम्मा।
अपने खून से सींच हमें ,
इस धरती पर लाई है अम्मा।
शत-शत तुझे नमन है अम्मा,
मेरी तू भगवन है अम्मा।

- डा. रश्मि शर्मा
संपादक, ’सुखदा’ हिन्दी मासिक,
सहारनपुर

तुम हो सोन चिरैया अम्मा, सारे घर परिवार की ।
तन में, मन में बसी हुई है, गंध तुम्हारे प्यार की ॥

- सुरेश सपन


मुझे सुलाकर के सूखे में
खुद गीले में सोई अम्मा ।

मुझे सुला कर खुद जगती थी
पलक नहीं झपकाई अम्मा ।

इसी लिये तो इस दुनिया में
भगवत्‌ रूप कहाई अम्मा ।

- डा. अमिता अग्रवाल
अध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग,
मुन्ना लाल जयनारायण खेमका गर्ल्स डिग्री कॉलिज,
सहारनपुर


नानी जैसी सुघढ़ घरेलू
दादी की परछाईं अम्मा।
बड़े - बड़े दुःख झेले बरसों
तनिक नहीं घबराई अम्मा।
भूली अपना दर्द हमेशा
मुझे देख मुस्काई अम्मा।
जब-जब छाये दुःख के बादल
याद तुम्हारी आई अम्मा।
कड़वी दुनिया में तू मीठी
किस मिट्टी की जाई अम्मा।
इस दुनिया की सारी नेमत
सिर्फ तुम्हीं में पाई अम्मा।

-कश्मीर सिंह
अध्यक्ष - विभावरी, सहारनपुर



तुझसे शिक्षा पाई अम्मा,
काम हमेशा आई अम्मा।
बिना ढाल - तलवार उठाये
बन गई लक्ष्मीबाई अम्मा।
सेवा सबसे बड़ा धर्म है,
मुझे यही सिखलाई अम्मा।
जब भी मैने ठोकर खाई,
दौड़ी-दौड़ी आई अम्मा।
भले पराया धन कहती है
माने नहीं पराई अम्मा ।

- मीनाक्षी एच. वर्मा, बरेली


तेज रहा चेहरे पर हर दम,
ऐसी थी मेरी भी अम्मा।
रोशन करती घर को हर दम,
एक सूत्र में बांधे अम्मा ।

- करुणा प्रकाश,
सहारनपुर


सुशांत जी, बड़ी ही अजीब सी तुकबन्दी मैने भी करने की हिमाकत की है।  कृपया सुधारात्मक एवं रचनात्मक स्तर पर इस तुकबन्दी के बारे में बतायें -

“अम्मा मेरे पास ही तो है,
अम्मा मुझसे दूर कहां है?
अम्मा मेरी प्यारी है, इस दुनिया में न्यारी है।
अम्मा से ही तो सब कुछ है,
अम्मा नही तो कुछ भी नही है।
अम्मा मैने खूब रुलाई
काम मेरे अम्मा ही आई
अम्मा ही मेरा जीवन है
कुछ भी कहो बड़ा विकल ये मन है।
अम्मा.......”

धन्यवाद,

अंकित…


मेरे बड़े भैया श्री विनोद कुमार गर्ग ’भारती’ ने कुछ पंक्तियां लिख भेजी हैं SMS द्वारा - पेश ए खिदमत हैं -

हर दुःख की भरपाई अम्मा
शिकवों की सुनवाई अम्मा

बचपन हो या हो तरुणाई
जीवन की परछाईं अम्मा !!

- विनोद कुमार गर्ग, दिल्ली

धन्यवाद भैया !


मां तो मां है, एक ही जैसी होती हैं - चाहे खाड़ी देश में हो या दिल्ली में! छिब्बर साहब को दो पंक्तियाँ गल्फ देश से भी आई हैं। शहीद सरबजीत सिंह ढींडसा की बहिन परविन्दर जी ने ये लिख भेजी हैं -

साथ - साथ मेरे रहती है
बन के इक परछाईं अम्मा !

शब्द अलग हैं पर भावनाओं में कितना साम्य है!!  परविन्दर जी को हमारा हार्दिक अभिनन्दन !


तन में रखकर तन को पाला
तब ’जननी’ कहलाई अम्मा
सुख देकर सबके दुःख बांटे,
सबकी देती गवाही अम्मा

लहू से सींचा. दूध से पाला
कतरा- कतरा सब दे डाला
दुआओं भरे आंचल की कलियां
कभी नहीं मुरझाई अम्मा।

वो कहते हैं नाक है मिलती
ये आंखें और ये चेहरा भी।
मैं तो बस सबको समझाती
मैं तेरी परछाई अम्मा।

- डा. अनिता शर्मा
387, न्यू आवास विकास,
सहारनपुर


संदीप शर्मा और फाल्गुनी ने कंप्यूटर पर बैठे - बैठे ये चार पंक्तियां लिख भेजी हैं -

रंग अलग है, जात अलग है, देश अलग है, दात अलग है।
हिन्दू मुस्लिम सिख, ईसाई, हर मजहब की बात अलग है।
सात कोस पर अलग है पानी, चौदह कोस पे अलग है बानी।
अलग नहीं बस वो है अम्मा, सब धर्मों की सांझी अम्मा ॥

गुड, वेरी गुड संदीप एंड फाल्गुनी !  ऐसे ही लिखते रहो और भेजते रहो !


काफिया मिलान का नहीं है, फिर भी पढ़वाने का मन है:

बिन छत का ये घर है मेरा
जब से स्वर्ग सिधारी अम्मा.

-समीर लाल ’समीर’


प्रिय सुशान्त जी,

घर लगता अब घर के जैसा
जब से घर में आई अम्मा
गाँव का घर छोड़ कर भी
घर को साथ में लाई अम्मा
सूने -सूने घर में मेरे
बगिया-सी महकाई अम्मा

बीती बातें सब बचपन की
रह -रह याद दिलाई अम्मा
चंदा-तारे दिखला कर
कैसे रोज़ खिलाई अम्मा
जब-जब उखड़ी निंदिया मेरी
बनती रही थपकाई अम्मा
जब मेरा माँगा दिला सकी न
बन ख़ुद खिलौना बहलाई अम्मा
जब -जब रूठा बिना बात के
गोद बिठा मनाई अम्मा
संगी-साथी की लम्बी कुट्टी में
खेली छुपा-छुपाई अम्मा
ख़ुद भले न कुछ लिख पाई
पर बनी मेरी लिखाई अम्मा
एक दादी की एक बाबू की
पांचो उंगली गिनाई अम्मा
जीवन की अनगिनत गणित में
बहुत काम में आई अम्मा
जीवन की एक सीख लगी
जब -जब है अजमाई अम्मा


दुःख की तपती धूप में
ठंडी-सी पुरवाई अम्मा
अपने मन को मार कर
जो करती थी कमाई अम्मा
बुरे वक्त में काम वो आई
बूँद-बूँद जो बचाई अम्मा
अपने गहने बेचकर भी
दीदी के हाथ रंगाई अम्मा
घर के चौके-चक्की में
ख़ुद भी पिसी-पिसाई अम्मा
उसके रहते कभी कमी लगे न
जैसे हर भरपाई अम्मा

जिस- जिस ने उसको समझा
उसके लिए कविताई अम्मा
उसका जोड़ा कभी न टूटा
जैसे नींव की जुड़ाई अम्मा
जब से बाबू नहीं रहे
तब से है कुम्हलाई अम्मा
अब तो खटिया पर रहती है
ख़ुद में सिमटी-सिमटाई अम्मा
आते -जाते छू लेते हैं
मूरत -सी अब पुजाई अम्मा !
मूरत -सी अब पुजाई अम्मा !!
मूरत -सी अब पुजाई अम्मा !!!

आपका नीलेश
मुंबई



सब को खूब हंसाती अम्मा
जीवन पथ दिखलाती अम्मा
जब भी मन दुविधा में होता
तुंरत समझ जाती है अम्मा.

हिम्मत खूब बंधाती अम्मा
जब भी किसी से झगडा होता
सुलह करा देती है अम्मा
पापा रहते व्यस्त काम में
बच्चों को संभालती अम्मा.

जब भी हमसे गलती होती
कर्तव्य बोध कराती अम्मा
भले ही कम पढ़ी हो अम्मा
पर हम सब को खूब समझती अम्मा.


वी. के. जैन,
मुख्य प्रबंधक, बैंक ऑफ़ इंडिया,
गाजियाबाद अंचल,
नॉएडा.

चार लाइनें मैं भी पेश कर रहा हूं -

हर घर को रोशन कर दे जो,
ऐसी जोत जलाई अम्मा ।

पैरों तले है जिसके जन्नत,
दोज़ख़ से रिहाई है अम्मा।

हर दम जिसकी ख़िदमत करता
मेरी बड़ी कमाई है अम्मा ॥

- जावेद खान सरोहा
अध्यक्ष, अदाकार ग्रुप, सहारनपुर



ये जीवन है रात अंधेरी,
मगर सुनहरी धूप है अम्मा ।
घर की शोभा, घर की बरक़त
ईश्वर का ही रूप है अम्मा !!

- के. के. गर्ग
अध्यक्ष, मानसी सांस्कृतिक चेतना मंच,
पारिजात, तिलक नगर,
सहारनपुर - फोन - 2661507



मन रूपी इन खेतों में,
करती रोज बुवाई अम्मा।
ये पूरा परिवार हमारा,
है तेरी परछाई अम्मा ॥

7:53pm 11-01-2009
ANKUR BHATIA(Aayaam)

मां ममता की मूरत है
मां कितनी खूबसूरत है
और नहीं कुछ बहुत जरूरी
मां की हमें जरूरत है।
- चन्दन कालड़ा


खुद कितना भी डर जाती हो,
मुझे न डरने देती अम्मा ।
दिन भर में थक जाती फिर भी,
मेरा दर्द भगाती अम्मा ।
नखरे कर कर मैं खाती थी,
अब मैं सब खा लेती अम्मा ।
बाल गूंथती तो रोती थी,
याद करूं वो चम्पी अम्मा ।
थपकी देके मुझे सुलाती,
मेरी अम्मा, प्यारी मम्मा ।
याद करूं मैं जब भी तुझको,
आंख मेरी भर आती अम्मा।
संगी-साथी भांप न पाते,
कैसे  तुझसे छिपाती अम्मा ।
व्यर्थ के झगड़े सहे हमेशा,
प्यार हमें सिखलाती अम्मा।
जीवन भर की तेरी मेहनत,
व्यर्थ न जाने दूंगी अम्मा।
दुनियां की सब खुशियां तेरे,
कदमों पे रख दूंगी अम्मा ॥

- डा. आंचल अग्रवाल, जमशेदपुर

रीत चला है शब्दकोष
भरने लगी हैं पानी
सारी उपमायें
गढ़ नहीं पा रहा हूं
वो बिम्ब,
दिखा सके जो तुम्हें
चुक गई है
कवितायें करने की कुव्वत
तुम ही कहो
कैसे लिखूं मां
तुम्हारे ऊपर कविता !

-मनु स्वामी
मुज़फ्फरनगर


फूलों की अंगनाई अम्मा,
खुशियों की पुरवाई अम्मा।
पापा अगर ग़ज़ल का मिसरा
तू है एक रुबाई अम्मा
कर दे झूठ-मूठ ही करदे
कर दे कान खिंचाई अम्मा ।

- सुरेश सपन

अम्मा मेरी बड़ी सयानी,
किसी की दादी - किसी की नानी।
इतने बच्चे शोर मचाते
उनको देखा ना चिल्लाते।
देख-देख मैं कुढ़ता रहता
प्यार से मुझको वह समझाती
अम्मा पास नहीं अब मेरे
तभी तुम्हें मैं ये कहता हूं
जब तक पास है अम्मा तेरे
तब तक बस तू मौज उड़ा ले।
कौन करेगा तेरी चिन्ता,
क्या खाया, क्या परेशानी
अम्मा को हरिद्वार घुमा दे
अपने सब तू पाप मिटा दे।
- अजय - Crazy Green 

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