रविवार, अगस्त 6

मैं देखता हूं (कविता)

जेठ की तपती हुई एक दोपहर में,
अपने ही विचारों में खोया हुआ
चला जा रहा हूँ सड़क के किनारे किनारे,
की अचानक मेरी दृष्टि पड़ती हैं एक स्कूल पर,
और में देखता हूँ......................

स्कूल की छुट्टी हो चली हैं,
कुछ सोचकर उस स्कूल की और चल देता हूँ ,
और एक पेड़ के नीचे कुछ दूर खड़ा हो जाता हूँ
मैं देखता हूँ..............................
की दिन के इस समय में भी
इन बच्चों में कितनी ऊर्जा हैं,
एक दूसरे के गले में हाथ डाल, हँसतें, डोलतें
एक दूसरे के कानों में कुछ बोलतें, फिर हँसतें,
अभी भी इनके चेहेरों पर फूल सी चमक को,
मैं देखता हूँ..............................

अचानक इनकी दृष्टि, एक बड़े दरवाज़े के बाहर खड़े
अपने पिता पर जाती हैं,
और जैसे उस सुन्दर चेहरे की चमक दोगुनी हो जाती हैं
मैं देखता हूँ.................................................

वो डगमग डगमग सी चाल, अचानक
दौड़ में बदल जाती हैं,
अपने वज़न से दोगुना भारी वो बस्ता,
जो कन्धों पर टंगा हुआ हैं,
बस अब उतरने को तैयार हैं ......क्योंकि,
इस भार को उठाने, बाहर कोई खड़ा हैं ,
मैं देखता हूँ................................

मैं देखता हूँ एक पिता को,
उसके चेहरे पर अचानक आयी उस हंसी को
जिसे उस छोटे से बच्चे की दौड़ में,
प्रेम की परिसीमा दिखती हैं

मैं देखता हूँ ......................................
की किस प्रकार वो आगे बढ़कर ,
उस बालक के छोटे छोटे कन्धों से बस्ता उतारता हैं
और उसके छोटे छोटे हाथों को पकड़कर
उसे घर की ओर ले चलता हैं,
मैं देखता हूँ.................................

मैं देखता हूँ ..............................
की किस प्रकार वो बालक, दिन भर घटी घटनाओं का विवरण,
विस्तार से, उत्साह-मग्न हो पिता को देता हैं
और बालक के इस उत्साह में,
पिता के चेहरे पर दौड़ती उस ख़ुशी को ....
मैं देखता हूँ ............................

पिता धीरे से उस बसते को
अपनी साइकिल के पीछे लगे
उस कैरिएर में फंसा लेता हैं ...और फिर
बालक को आगे डंडे पर बैठा, चल पड़ता हैं
इतने में ही उस बालक का एक मित्र बराबर से
अपने पिता के साथ स्कूटर से निकलता हैं
दोनों एक दूसरे को देख ख़ुशी से हाथ हिलातें हैं
किसी प्रकार का अंतर्द्वंद नहीं हैं इन बालकों में
मैं देखता हूँ ............................
निश्छल , निष्कपट इनका चरित्र
इनके चेहरे के भावों में, मैं देखता हूँ.....

पिता तभी अपनी जेब से एक रुमाल निकालता हैं
और उस छोटे से बालक के सिर पर रख
साइकिल से चल पड़ता हैं I
उन दोनों में होती बातचीत में, मैं आयु के
घटते हुए अंतर को देखता हूँ
की प्रकार उस बालक के हर विवरण, हर विस्तार
पर पिता की मूक सहमती , उसकी हंसी से झलकती हैं
मैं देखता हूँ..................................

धीरे धीरे दोनों मेरी आँखों से ओझल हो जातें हैं ,
और में इस पूरी घटना को, कही अंतर्मन में
छुपाकर, संभालकर, आगे बढ़ लेता हूँ
परन्तु मानवीय चरित्र के इस पक्ष को
एक नए दृष्टिकोण से आज....मैं देखता हूँ।

- अंकुर मल्होत्रा 

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