रविवार, अगस्त 6

डा. विजेन्द्र पाल शर्मा (कविताएं)

दूसरा कोई नहीं है !

तुम हृदय के मंच पर जब से वि‍राजे
दृष्‍ि‍टपथ में दूसरा कोई नहीं है।

तुम उषा की लालि‍मा में, ज्‍योत्स्ना में भी तुम्‍हीं हो
प्राण में अब तो नि‍रन्‍तर, मीत अनहद नाद बाजे।।

आज झूठा हो गया है, सत्‍य का प्रति‍मान दर्पण।
मैं खड़ा हूं सामने लेकि‍न तुम्‍हारा रूप साजे।।

मैं रहा प्‍यासा युगों से, सि‍न्‍धु पीने की तृषा थी।
नेह की इक बूंद पी तो सृष्‍ि‍ट में संतृप्‍ि‍त राजे।।

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दोहे 

तू मेरा प्रति‍बि‍म्‍ब हो, मै तेरी पहचान ।
फि‍र दुनि‍या में कौन है, हम जैसा धनवान॥

राम कभी थे ही नही सरकारी फरमान। 
गद्‌गद्‌ होकर छोडता, कलयुग अपने बाण॥
अरबों खरबों ले उड़े, अन्‍तरि‍क्ष में यान।
भूख धरा को नोचती, जयति‍ जयति‍ वि‍ज्ञान॥
छोटे ने क्‍या लि‍ख दि‍या, होता नहीं यकीन।
करो जतन कुछ बाप का, देता नही ज़मीन॥
दि‍ल न दुखे मॉ बाप का, रहे हमेशा ध्यान।
पंख उन्‍होंने ही दि‍ये, जि‍नसे भरी उड़ान॥

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शिकायत 

दादी। पापा बड़े खराब
पीकर आते रोज शराब।
खूब पीटते हैं मम्‍मी को
छोटी सी प्‍यारी पम्‍मी को।
मेरे दांत उन्‍होने तोड़े
घर के सारे बर्तन फोड़े।
लाकर देते नही कि‍ताब
दादी। पापा बड़े खराब॥
- डा. विजेन्द्र पाल शर्मा 

1 टिप्पणी:

जो विशेष पसन्द किये गये !