रविवार, अगस्त 6

बेटियां (कविताएं)


एक

जीवन भर
सजाती हैं
अपनों का संसार!
न जाने क्यों
बेटियां
लगती हैं भार !


दो

समय
असमय
रोप दी जाती हैं
अजानी माटी में
धान की पौध की तरह!

जलवायु
अनुकूल हो या
प्रतिकूल
संभलना,
खिलना और
बिखरना
यही इनकी नियति है!
बेटियां
न जाने क्यों
अभागी होती हैं।

तीन


पीढी दर पीढी
मां ने सिखाया
बेटियों को
सिर्फ सहना!

दुःख हो या सुख
खुश रहना

अभावों को भी
समझ लेना
अपना ’सौभाग्य’ !

मां !
तुमने
क्यों नहीं सिखाया?
बेटी
सच को सच
झूठ को झूठ कहे
दुःख में भी
सुख में भी
तटस्थ रहे ?

ससुराल और
मायके जैसे
दो सशक्त तटों के
संरक्षण में
उन्मुक्त नदी सी
बहती रहे?













- कश्मीर सिंह
संप्रति - 
सहायक महाप्रबन्धक,
इंडियन ओवरसीज़ बैंक,
पटियाला 

1 टिप्पणी:

  1. आपका आभार मित्र कि आपने मेरी इन कविताओं को the-Saharanpur.com पर स्थान दिया

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