शनिवार, अगस्त 5

देश का अर्चन करो तुम !

देश का अर्चन करो तुम।
राष्‍ट्र के बि‍खरे अनागत सत्‍य का अंकन करो तुम।।

स्‍वार्थ प्रेरि‍त मार्ग त्‍यागो,
वीर युग पथ पान्‍थ हो तुम।

सृजन के नूतन प्रणेता,
क्‍यों वृथा दि‍ग्‍भ्रान्‍त हो तुम।
नीलकण्‍ठी मेरूचि‍त से पवन का मन्‍थन करो तुम।।

नवल ज्‍योति‍ प्रदीप्‍त हो तो
स्‍नेह से दीपक भरेंगें।
शीष नत हो तो स्‍वयं,
आशीष मस्‍तक चूम लेंगे।
साहसी वि‍जि‍गीषु भारत भूमि‍ का वन्‍दन करो तुम।।

क्‍यों सुरा में डूबती सी
बेबसी की शाम बोझि‍ल।
भारती लाचार बन्‍धक,
संकुचि‍त क्‍यो नाद कोकि‍ल
मौन तोड़ो, जन वि‍रोधी नीति का खण्‍डन करो तुम।।

रश्‍ि‍मयों की छुअन पाकर
भोर की कलि‍यॉं खि‍लें अब।
कर तमस का आचमन
शिव साधना मिल कर करें सब
रक्त रंजित, अश्रु मंडित धूल को चंदन करो तुम॥

- डा. रागिनी ’भूषण’ 
अध्यक्ष, संस्कृत विभाग
Graduate's College for Women
Jamshedpur
Phone : 0657 - 2227857

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