शनिवार, अगस्त 5

बांधना है मीत को !

स्व. प्रो. योगेश छिब्बर

बांधना है मीत को !

बॉंधना है मीत को, बॉंधूं मगर कि‍स डोर से मैं।
हर दि‍शा है छोर पी का, बॉंध लू कि‍सी छोर से मैं।


एक तो है डोर तन की, दूसरी है डोर मन की,
एक है अधि‍कार डोरी, इक समर्पण के छुअन की।
बॉंध लूं मुस्‍कान से या ऑंसूओ के ज़ोर से मैं।
हर दि‍शा है छोर पी का बांध लूं कि‍स छोर से मैं।

सोचती हूं सॉंस डोरी से पि‍या का रूप बॉंधूं,
मीत मुख की गुनगुनी सी, सॉंवली सी धूप बॉंधूं।
बांधं लूं सि‍गार से, या फि‍र नयन की कोर से मैं।
हर दि‍शा है छोर पी का बॉंध लूं कि‍स छोर से मैं।

बॉंधने का है हुनर क्‍या, हार कर पूछा जि‍या से,
आप बन जा छॉंह पी की, बांध ले बँधकर पि‍या से।
रूप है हर ओर पी का, बॉंध लूं कि‍स छोर से मैं।
हर दि‍शा है छोर पी का, बांध लूं कि‍स छोर से मैं।

- स्व. प्रो. योगेश छिब्बर

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