बुधवार, अगस्त 9

सहारनपुर को स्मार्ट सिटी कैसे बनाया जाये?

जैसा कि शासन व प्रशासन की सही सोच है, किसी भी शहर के लिये स्मार्ट सिटी योजना का प्रारूप उस शहर की विशिष्ट स्थिति व परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बनाया जाना चाहिये।  इस दृष्टि से सहभागिता को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है, जनता से सुझाव मांगे जा रहे हैं, ताकि जो भी योजना बने उसमें शहर के नागरिकों की इच्छाएं और अपेक्षाएं झलकती हों!


अब सहारनपुर की बात करें तो हम जानते हैं कि सहारनपुर का 2500 वर्ष पुराना इतिहास है; उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड की सीमाएं यहां स्पर्श करती हैं;  मुंबई-अमृतसर, हावड़ा-अमृतसर, दिल्ली-देहरादून रेल मार्ग यहां से होकर गुज़रते हैं।  सड़क मार्ग से देखें तो  दिल्ली-यमुनोत्री मार्ग के अलावा  देहरादून-हरिद्वार–अंबाला–चंडीगढ़–अमृतसर जाने-आने के लिये सहारनपुर बहुत सुविधाजनक सड़क मार्ग प्रदान करता है। गंगा व यमुना के मध्य का क्षेत्र होने के कारण यहां की भूमि उपजाऊ भी बहुत है।

मानों इतना काफी न हो तो यहां मां शाकुंभरी देवी, रिमाउंट डिपो, आई.टी.सी. स्टार पेपर मिल, वुडक्राफ्ट उद्योग, कृषि उपकरण उद्योग, कपड़े का विशाल होलसेल मार्किट, दारुल उलूम, आई.आई.टी. रुड़की का पल्प एवं पेपर टैक्नोलॉजी विभाग, सीपरी (CIPPRI), मैडिकल कॉलेज, डाक-तार प्रशिक्षण विभाग, कंपनी बाग जैसे अनेकानेक महत्वपूर्ण आकर्षण यहां मौजूद हैं और स्पोर्ट्स कॉलिज भी शीघ्र ही उपलब्ध कराये जाने की योजना चल रही है।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि सहारनपुर की स्थिति ऐसी है कि इसे अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर एक ऐसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है जहां -
  • ऐतिहासिक पर्यटन
  • धार्मिक पर्यटन
  • सांस्कृतिक पर्यटन
  • शैक्षिक पर्यटन
  • औद्योगिक पर्यटन
  • व्यापारिक पर्यटन
  • चिकित्सकीय पर्यटन
  • प्राकृतिक पर्यटन
आदि आदि में रुचि रखने वाले आना चाहें ! यह ठीक है कि हरिद्वार और रुड़की अब सहारनपुर की प्रशासनिक व्यवस्था के अन्तर्गत शामिल नहीं माने जाते किन्तु इन स्थलों की दूरी सहारनपुर से आज भी उतनी ही है, जितनी 20-30 साल पहले थी! पर्यटन आकर्षण के रूप में सहारनपुर को इनका जितना लाभ पहले मिल सकता था, लगभग उतना ही अब भी मिल सकता है।   सहारनपुर को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन केन्द्र के रूप में सुविधा संपन्न नगर बनाने के लिये जो कुछ भी आवश्यक हो, वह सब कुछ किया जाये तो सहारनपुर अपने आप ही स्मार्ट सिटी बन जायेगा। :

गाज़ियाबाद, इलाहाबाद, अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली आदि शहरों की तरह ही सहारनपुर को भी हम दो भागों में बांट कर देखा करते हैं – पुराना सहारनपुर और नया सहारनपुर। पुराना सहारनपुर यानि, अत्यधिक घनी बस्ती, व्यस्त बाज़ार, बिना किसी सम्यक् योजना के बने हुए प्राचीन भवन, संकरी गलियां व सड़कें। इस क्षेत्र में रहने वाले लोग इन पुराने मकानों, हवेलियों में कई दशकों या शताब्दियों से रहते चले आ रहे होंगे और ऐसे ही भविष्य में भी रहते रहना चाहेंगे।  मुझे नहीं लगता कि इस क्षेत्र के अधिकांश लोग अपना मकान व कारोबार छोड़ कर नये सहारनपुर में जाना चाहेंगे। ऐसे में हमें यह मान कर चलना होगा कि हमें इस क्षेत्र की समस्याओं को दूर तो करना है किन्तु यह काम यहां के नागरिकों को विस्थापित किये बिना ही हो जाये तो बेहतर है। प्रशासन व शासन के विचारार्थ पुराने सहारनपुर की समस्याओं के समाधान व सौन्दर्य वृद्धि हेतु कुछ बिन्दु प्रस्तुत हैं:-

यातायात समस्या

पुराने सहारनपुर की सबसे बड़ी समस्या यातायात की ही गिनाई जा सकती है। इस क्षेत्र के निवासी यदि इसी क्षेत्र में रहने व कारोबार करने की जिद करें तो उनको इस बात के लिये तैयार होना चाहिये कि उनकी व्यक्तिगत कार, मोटर साइकिल व स्कूटर आदि सुबह 9 बजे से रात्रि 9 बजे तक सड़क पर नहीं आयेंगे। और यदि आयेंगे तो 100 रुपये प्रतिदिन दोपहिया वाहन हेतु, 500 रुपये प्रतिदिन तिपहिया वाहन हेतु और 1000 रुपये प्रतिदिन कार हेतु देकर ही वह पुराने सहारनपुर में प्रवेश कर सकेंगे या अपने घर से / पार्किंग स्थल से अपने वाहन बाहर सड़क पर निकाल सकेंगे। रात्रि 9 बजे से प्रातः 9 बजे के बीच में ही इस इलाके में वाहन संचालन अनुमन्य होगा। सिर्फ साइकिल की ही अनुमति दी जाए!

इसके अतिरिक्त, इस पुराने इलाके के निवासियों को केवल पुराने वाहन को बेच कर उसी श्रेणी के नये वाहन को खरीदने की अनुमति दी जाये, और नये वाहन खरीदने की अनुमति न दी जाये। यदि नये वाहन खरीदने का बहुत शौक है तो नये सहारनपुर में अपना आवास बनायें और पुराना सहारनपुर छोड़ दें। अंबाला रोड, देहरादून रोड की ओर से किसी भी चौपहिया या तिपहिया वाहन को भगत सिंह मार्ग, नेहरू मार्किट, लोहानी सराय, बंजारन स्ट्रीट, ढोली खाल, मटिया महल, खुमरान पुल रोड की ओर जाने की अनुमति दिन में न हो!

बिजली के तार:

सड़कों व गलियों में जितने भी बिजली के खंभे लगे हैं, उन सब को हटाकर भूमिगत विद्युत तारों की व्यवस्था की जाये।

जर्जर भवन: 

जितने भी भवन जर्जर अवस्था में हैं, नगर निगम उनका कब्ज़ा अपने हाथ में लेकर उनको गिरा दे व उनके स्थान पर….

  • फुटकर दुकानदारी हेतु बहुमंजिला दुकानें बना कर किराये पर दी जायें व भूतल पर पार्किंग व्यवस्था रखी जाये।
  • फूड प्लाज़ा, जन – सुविधाएं आदि प्रदान की जायें।
  • फायर ब्रिगेड के छोटे-छोटे कार्यालय बनाये जायें जिनमें बड़े ट्रक के स्थान पर ऐसे छोटे वाहन हों जो आवश्यकता पड़ने पर संकरी गलियों में जा सकें।
  • पुराने सहारनपुर में यदि कोई व्यक्ति अपनी भू-संपत्ति बेचना चाहे तो पहले नगर निगम उस संपत्ति को खरीदने का प्रस्ताव करे और यदि नगर निगम न खरीद सके या न खरीदना चाहे तो पुराने सहारनपुर में रहने वाला कोई अन्य व्यक्ति उसे खरीद सकता है। बड़े – बड़े आवासीय भवन हेतु कोई भी नक्शा पास न किया जाये। पुराने सहारनपुर में छोटी-छोटी रिटेल दुकानदारी को ही प्रोत्साहन दिया जाये और पैदल चलने वालों के लिये समस्त सुविधाएं प्रदान की जायें। सहारनपुर आने वाले पर्यटक पुराने सहारनपुर का आनन्द उठाना चाहें तो उनको आकर्षित करने के लिये हर संभव प्रयास किया जाना चाहिये।

ठोस कचरा प्रबन्धन 


हर दुकानदार के लिये यह अनिवार्य हो कि वह नगर निगम द्वारा उपलब्ध कराये गये कूड़ेदान में रात्रि में, दुकान बन्द करते समय अपनी दुकान का या घर का कूड़ा डालें। शिमला आदि नगरों में यह व्यवस्था बहुत सफलता पूर्वक संचालित की जा रही है। वहां पर रात्रि में नगर निगम के दो ट्रक सड़क पर निकलते हैं, पहला ट्रक कूड़ेदान खाली करता चलता है और दूसरा ट्रक पानी के पाइप की धार मार कर सड़क को धो देता है ताकि कूड़े के छोटे-छोटे अवशेष यदि हों भी तो नाली में चले जायें। सहारनपुर में भी इस व्यवस्था को लागू कराया जाना चाहिये। बोमनजी रोड, चकरौता रोड आदि सड़कों पर दिन भर कूड़ा संग्रह केन्द्रों पर कूड़ा पड़ा हुआ सड़ता रहता है जिसमें सुअर, गाय, कुत्ते, घोड़े, गधे आदि मुंह मारते रहते हैं। इससे भी अधिक कष्टकर स्थिति ये है कि इन कूड़े के ढेर में छोटे - छोटे बच्चे रद्दी बीनते रहते हैं।

यदि रात्रि में कूड़ा सड़क पर न डाला जा सकता हो तो एक दूसरा उपाय यह है कि छोटे ट्रक (मोबाइल कूड़ा संग्रह केन्द्र)  प्रातः दुकानों के आगे से निकलें और सायरन बजा कर दुकानदारों व घरों को अपने आगमन की सूचना दें ताकि दुकानदार अपनी दुकान के कूड़े वाला डस्टबिन लाकर ट्रक में खाली करने के लिये दे सकें।   इस व्यवस्था को लागू करने से सड़क पर कूड़ा फैलने व उसे जे.सी.बी. मशीन से उठवाने की समस्या ही समाप्त हो जायेगी।

वुड क्राफ्ट

देशी- विदेशी पर्यटकों के लिये सहारनपुर की काष्ठकला आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र है। नगर निगम को बंजारन स्ट्रीट पर मौजूद किसी पुराने जर्जर भवन को गिराकर उस भूमि पर एक बहुमंजिला काष्ठ कला संग्रहालय का निर्माण करना चाहिये जिसमें प्रत्येक तल पर अलग – अलग प्रकार की कलाकृतियां प्रदर्शित की जायें। जैसे भूतल पर भारी फर्नीचर, प्रथम तल पर फोल्डिंग हल्का फर्नीचर, द्वितीय तल पर डब्बे, मोमबत्ती स्टैंड आदि दैनिक उपयोग की वस्तुएं व तृतीय तल पर विशिष्ट कलाकृतियां प्रदर्शित की जायें। एक तल ऐसा भी हो जिसमें कलाकार काष्ठ कलाकृतियों पर आकर्षक पच्चीकारी करते हुए देखे जा सकें। इन कलाकारों को नित्य नये डिज़ाइन दिये जायें। काष्ठ कलाकृतियों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया दिखाने के लिये एक ऑडियो-विज़ुअल सुविधा-संपन्न सभागार भी हो। इस संग्रहालय के भीतर चित्र खींचने की अनुमति किसी को न दी जाये परन्तु सभी कलाकृतियों के चित्र (पेपर प्रिंट) काउंटर पर बिक्री हेतु उपलब्ध कराये जायें! यहां पर प्रदर्शित काष्ठकला कृतियों की बिक्री करते हुए इस संग्रहालय को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। विदेशी ग्राहकों को यहां पर आने के लिये प्रोत्साहित किया जाये, निर्यातकों व निर्माताओं से संवाद सुलभ कराया जाये। यदि किसी कलाकृति का बड़ा ऑर्डर मिले तो सबसे पहले उसी निर्माता को प्रस्ताव दिया जाये जिसने वह मूल कलाकृति बनाई हो ! यदि वह रुचि न ले या उसके लिये ऑर्डर लेना व्यावहारिक न हो तो अन्य निर्यातकों को बैठा कर बोली लगाई जा सकती है।

पांवधोई 

पांवधोई नदी को पर्यटकों के लिये प्रमुख आकर्षण के रूप में विकसित किया जाना चाहिये जिसमें धोबी घाट के स्थान पर हर की पैड़ी जैसा स्नान घाट हो, सुबह-शाम आरती हो, नदी में पैडल बोट हों, पानी इतना साफ हो कि लोग आचमन कर सकें, नहा सकें। इसके लिये जरूरी होगा कि नदी में गिरने वाले सभी सरकारी – गैर सरकारी नाले व नालियां बन्द किये जायें, ठोस कूड़ा गिराया जाना पूरी तरह से बन्द हो। दोनों ओर के घाट पक्के बनाये जाएं। इस कार्य में श्री अजय गुप्ता (शिव धाम) का यथासंभव सहयोग लिया जाये। सुबह – शाम पर्यटकों की सुविधा के लिये आरती देखने के लिये घाट की सीढ़ियों पर बैठने की व्यवस्था हो!
सार्वजनिक परिवहन : पुराने सहारनपुर तक आने व यहां से अन्य स्थानों तक जाने के लिये अंबाला रोड, बेहट रोड, कलसिया रोड, बोमनजी रोड आदि पर मिनी बसें / गैर-प्रदूषण कारी तिपहिया वाहन स्टैंड बनाये जायें किन्तु इनको पांवधोई नदी का कोई भी पुल पार करते हुए पुराने सहारनपुर नगर में प्रवेश की अनुमति न हो।
स्मार्ट सिटी के लक्ष्य को पाने के लिये पर्यावरण के संरक्षण की ओर ध्यान देना परमावश्यक है। गंदगी /प्रदूषण को बढ़ावा देने में तबेलों, औद्योगिक इकाइयों व कमेलों का मुख्य योगदान रहता है। ऐसे में उनकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिये:

डेयरी व तबेले

सहारनपुर शहर में डेयरियां व तबेले गंदगी व बीमारियों का घर बने हुए हैं। पुराने सहारनपुर में जितनी भी डेरियां, तबेले आदि हैं उन सब को शहर से बाहर जाने के लिये कहा जाये ताकि शहर के बीचों-बीच भैंसों व गाय के झुंड सड़कों पर घूमते व गोबर करते हुए न पाये जायें। इनके लिये शहर से बाहर देहरादून रोड, दिल्ली रोड, अंबाला रोड, बेहट रोड, चिलकाना रोड, कलसिया रोड आदि पर विशाल भूखंड की व्यवस्था की जानी चाहिये ताकि सारे तबेले वहां शिफ्ट हो जायें। ऐसे हर स्थल पर पशु चिकित्सालय की भी व्यवस्था हो, गोबर गैस प्लांट लगाये जायें, गाय भैंसों के चारे के लिये समुचित व्यवस्था भी हो! पशुओं के चारे के लिये ग्रीन बैल्ट विकसित की जाये। इन सब तबेले वालों से दूध वहीं खरीद लिया जाये और शहर में विक्रय केन्द्र बना दिये जायें जैसे दिल्ली और गाज़ियाबाद में मदर डेयरी के दुग्ध वितरण केन्द्र बने हुए हैं। दूध, दही, क्रीम, मक्खन आदि समस्त उत्पाद वहां पूर्णतः मानकीकृत हों व उनके मूल्य भी गुणवत्ता के अनुरूप एक समान हों। यदि भूखंड तलाशने की समस्या हो तो हर बड़े राजमार्ग पर अत्यन्त विशाल भूखंडों पर सत्संग भवन बने हुए हैं। उचित मुआवज़ा देकर सरकार उनके कुछ अंश को अधिगृहित कर सकती है या किराये पर ले सकती है।

कमेले 

पुराने सहारनपुर में कोई भी कमेला नहीं होना चाहिये। पशुओं का कटान शहर से बाहर किसी सुनसान स्थान पर ही हो।

औद्योगिक इकाइयां

प्रदूषण फैलाने वाली सभी औद्योगिक इकाइयों के लिये शहर से बाहर मौजूद औद्योगिक स्थानों का आवश्यकता अनुसार विस्तार किया जाना चाहिये। प्रदूषण नियंत्रण हेतु प्रभावी उपाय करने के लिये उनको विवश किया जाना चाहिये।

औद्योगिक विकास एवं प्रशिक्षण

सहारनपुर में जिन – जिन उद्योगों की इकाइयां बहुतायत में हैं उनका इस प्रकार विकास किया जाना चाहिये कि जिसमें प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण रहे, शोध व विकास हेतु विशेष प्रयास हों और रोजगार के अवसर बढ़ें। इस दृष्टि से...

एक ऐसा प्रशिक्षण संस्थान जिसमें काष्ठ कला, कृषि उपकरण, पशु चिकित्सा, कागज़ व लुग्दी निर्माण, चीनी व खांडसारी, तंबाकू आदि स्थानीय उद्योगों से संबंधित शोध व प्रशिक्षण कार्य होता हो।  ये संस्थान इन उद्योगों को कुशल कर्मचारी उपलब्ध कराने में सक्षम होने चाहियें।  सच तो ये है कि ये कार्य जिला उद्योग केन्द्र व आई.टी.आई. को करना चाहिये था, यदि उनका संचालन कर रहे अधिकारियों में इच्छा शक्ति होती तो वह ये कार्य कर भी सकते थे किन्तु वहां पर मौजूद सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों में ऐसा करने की कोई इच्छा ही नहीं है। ऐसे में चैंबर ऑफ कॉमर्स जैसी कोई संस्था बना कर, जिसका संचालन व नियंत्रण उद्यमियों के हाथ में ही हो, इन संस्थाओं को उनको सौंप देना चाहिये।

होज़ियरी उद्योग 

सहारनपुर में होज़ियरी क्लस्टर विकसित किया जाना चाहिये ताकि हिरन मारान और आस-पास कार्यरत सभी होज़ियरी निर्माण इकाइयों को समुचित सुविधा संपन्न स्थान मिल सके।

कंपनी बाग (राजकीय उद्यान सहारनपुर) 

कृषि एवं उद्यान विकास में कंपनी बाग यानि औद्यानिक प्रयोग व फल प्रसंस्करण केन्द्र (Horticultural Experiment and Food Preservation Centre) कुछ साल पहले तक एक अत्यन्त महत्वपूर्ण शोध संस्थान के रूप में भूमिका निभाता चला आया है।  अब उसका स्तर नीचे गिरा कर उसे शोध केन्द्र के स्थान पर केवल औद्यानिक प्रयोग व फल प्रसंस्करण का स्वरूप दे दिया गया है।  और अब तो इसे केवल मनोरंजन व व्यापारिक केन्द्र के रूप में परिवर्तित करके शिक्षण - प्रशिक्षण संस्थान के रूप में इसका अस्तित्व समाप्त कर देने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। कुछ लोगों को लगता है कि वहां पर झूले, खाने पीने की दुकानें, मनोरंजन के अन्य साधन आदि की व्यवस्था की जानी चाहिये। मेरे विचार में यह इस संस्थान की हत्या करने का प्रयास है। इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क (चन्द्रशेखर आज़ाद पार्क) की तर्ज़ पर इसका विकास हो तो कोई बुराई नहीं है।  खाने - पीने का कोई भी स्टॉल यहां पर स्थापित नहीं किया जाना चाहिये और न ही कोई अन्य दुकान बनाये जाने की यहां अनुमति दी जानी चाहिये!  जिस उच्च स्तर की शोध सुविधाएं यहां मौजूद हैं अथवा रही हैं, वैसी सुविधाएं आस-पास के कई अन्य जिलों में भी उपलब्ध नहीं होंगी! उन सब को आहिस्ता – आहिस्ता खत्म कर देना एक मूर्खतापूर्ण कार्यवाही होगी जिससे हमें बचना चाहिये।

जल-मल निकासी व्यवस्था

सहारनपुर में भूजल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है क्योंकि एक ओर भूजल के स्रोतों को अनावश्यक रूप से खाली किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वर्षा जल के संचय की दिशा में प्रभावी पग नहीं उठाये जा रहे हैं। सभी सरकारी भवनों, होटलों, स्कूलों व अन्य विशाल भवनों में रेन-वाटर-हार्वेस्टिंग का प्रबन्ध कानूनन अनिवार्य किया जाये व कोताही बरतने वालों को दंडित किया जाये। ठोस कचरे के प्रबन्धन के लिये जनता को शिक्षित करना व सुनहरा कल जैसी योजनाओं को और विस्तार देना परम आवश्यक है। नगर की व्यस्त सड़कों पर कूड़ा संग्रह केन्द्र बनाने की नगर निगम की परम्परा को तुरन्त प्रभाव से बन्द किया जाना चाहिये। सड़क पर कूड़ा डालने वालों को दंडित किया जाये। Biodegradable / Recyclable and Hazardous waste के निपटारे के लिये जरूरी है कि इन सब को घरों से ही अलग-अलग कर दिया जाये ताकि जिस प्रकार का कूड़ा हो, उसका समुचित निपटारा तुरन्त हो सके।

सहारनपुर में सरकारी सीवर लाइन सिर्फ पुराने सहारनपुर में पांवधोई नदी के दोनों तटों पर ही होती थी और वह भी अब बन्द (choked) है, ऐसा बताया जाता है।  उसको तुरन्त चालू करना अत्यावश्यक है ताकि नदी में गिरने वाले सभी नाले - नालियां सीवर में छोड़े जा सकें और पांवधोई नदी को गन्दे नाले के रूप में इस्तेमाल करने की आदत खत्म हो सके।  इसके अलावा पूरे शहर में सीवर लाइन के बजाय सेप्टिक टैंक बनाये जा रहे हैं।  नगर निगम को यह देखना होगा कि स्मार्ट सिटी में सीवर लाइन ज्यादा उपयुक्त है या सेप्टिक टैंक !

इस के अतिरिक्त और भी अनेकानेक सुझाव दिये जा सकते हैं, परन्तु एक सुझाव जो सबसे अधिक जरूरी लगता है वह ये है कि स्मार्ट सिटी के निर्माण में सफलता पाने के लिये भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनानी परमावश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया जायेगा तो सारे प्रयास व्यर्थ ही हो जाने वाले हैं।

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