रविवार, अगस्त 6

पूरा मुल्क हाथ धो रहा है ! (हास्य व्यंग्य)

लंबा टीका, उससे प्रतिद्वन्दिता करती लंबी चोटी, सफेद लकदक धोती-कुर्ता और गले में लाल साफा। पंडित त्रिलोकीनाथ सुबह-सवेरे घर से निकलते तो पूरी गली में नहाये धोए से अलग ही दिखाई देते। जो भी मिलता उसे राम-राम करते और आगे बढ़ जाते। रोज का यह सिलसिला ही उनकी मानो नियति थी। लेकिन आज घर से निकले तो परम्परा से हटकर नजर आये। आज उन्होंने नहीं बल्कि लोगों ने उन्हें राम-राम, नमस्ते की। चूंकि पंडितजी का ध्यान आज कहीं और था। सब आश्चर्यचकित ! सबने देखा, पंडित जी घर से निकले और गली के सार्वजनिक नल पर रुककर हाथ धोने लगे। पंडित त्रिलोकीनाथ ने हाथ धोए और साफे से हाथ पोंछ लिए, फिर धोए और पोंछ लिए, फिर धोए और फिर पोंछ लिए। यह प्रक्रिया उन्होंने पूरे सात बार दोहराई।


मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पूछ लिया, “ पंडित जी क्या हुआ? आप तो नहा-धोकर निकलते हो, फिर यह बार-बार हाथ क्यों धो रहे हो, आज कुछ खास है क्या?“

पंडित जी ने गर्दन घुमायी, बोले, “सच्चिदानन्द, तुम सच कह रहे हो। आज हाथ-धुलाई दिवस है, सोचा मैं भी हाथ धोकर सार्थक कर लूं। जीते-जी मन के कीटाणु तो साफ होते नहीं, हाथों के कीटाणु तो साफ कर लूं।“

‘अरे पंडित जी, आपको हाथ धोने की क्या जरूरत है, आप तो रोज ही हाथ धोते है, जिस यजमान के यहां जाते है, पहले वह आपके हाथ धुलाता है और फिर आप उसे धोते हैं।“ मैंने हंसते हुए कहा।

मेरा अनुमान था बात-बात में अपनी बतीसी निकालने वाले पंडित जी मेरी इस बात पर अपना पूरा जबड़ा ही खिलखिलाकर बाहर रख देंगे। लेकिन मैं गलत निकला। पंडित जी यह सुनकर एकदम गंभीर हो गए और बोले, ‘सच्चिदानंद तुम सच्चे आदमी हो, इसलिए ऐसा उपहास कर रहे हो, लेकिन तुम नहीं जानते पूरा मुल्क हर रोज हाथ धो रहा है। जिसे जब भी, जहां भी अवसर मिल रहा है, हाथ धो रहा है।’ पाप धोने वाली गंगा की सफाई के नाम पर छोटे से लेकर बड़े अफसरों और कुछ राजनेताओं तक ने हाथ धोए है। गंगा सफाई अभियान पर अरबों खर्च कर दिए गए, पर गंगा ज्यों की त्यों है। बल्कि गंगा पहले से और ज्यादा मैली हो गई है। अब अगले वर्ष हरिद्वार में कुम्भ शुरू हो रहा है, करोड़ो श्रद्धालु आयेगें और उसी गंगा में डूबकी लगायेंगे। ये तो लोगों की श्रद्धा है जो अभी तक गंगा जीवित हैं, अन्यथा गंगा अभी तक गटर बन गई होती। गंगा सफाई के नाम पर आगे फिर हाथ धोने के लिये एक नयी योजना की तैयारी है। अरबो-खरबों आयेगें और बंट जायेगें, जिसे जैसा अवसर मिलेगा हाथ धो जायेगा।

पंडित जी आगे बोले, ‘गंगा जी ही क्यों देश की सुरक्षा के लिये खरीदे जाने वाले हथियारों की खरीद में सेना के अफसर और क्वात्रोची सरीखे न जाने कितने हाथ धो रहे है, और धोए भी क्यों न, जब क्लीन चिट देने को सरकारों में शुभचिंतक नेता बैठे है।’ पंडित जी इसके बाद भी रूके नहीं लगातार बोलते चले गए। ‘दरवाजे पर खड़ा अर्दली लोगों को साहब से मिलाने के नाम पर हाथ धो रहा हैं। टैक्स बाबू और अफसर टैक्स लगाने व घटाने के नाम पर हाथ धो रहा हैं। पेशकार बाबू फाइल सरकाने के नाम पर हाथ धो रहा है। कई सरकारों के मंत्री, अफसर विदेश में प्रशिक्षण के नाम पर हाथ धो रहे हैं, और विदेशों में घूमने का सुख अलग से। थाने के सिपाही से लेकर दरोगा और बड़ा अफसर तक आदमी को किसी केस में झूठा फंसाने और मुल्जिम को बचाने में हाथ धो रहा है। लाखों लोग एनजीओ बनाकर हाथ धो रहे है।

पंडित जी लगातार बोले जा रहे थे और मैं उनकी इस विद्वता पर मंत्रमुग्ध था। पंडित जी को मैंने ही बामुश्किल रोका, मैंने कहा, ‘लेकिन यह दिवस तो पूरी दुनिया में 15 अक्टूबर को मनाया जाता है और आप आज हाथ धो रहे है।’ पंडित जी ने मेरा ज्ञान बढ़ाया, बोले, ‘अरे भाई, हिन्दुस्तान में आज ही मनाया जा रहा है। वैसे भी हिन्दुस्तान तो नकल करता है ना। जब पूरी दुनिया किसी काम को कर चुकी होती है, तो वह हमारे देश में शुरू होता है।’

पंडित जी के इस गंभीर चितंन पर मैं खामोश था। मुझे लगा पंडित त्रिलोकीनाथ यूं ही त्रिलोकी नहीं है पत्रा-पोथी के अलावा भी दुनियादारी की पूरी खबर रखते है। पंडित जी राम-राम कहकर आगे बढ़ चुके थे।

- डा. वीरेन्द्र ’आज़म’
पत्रकार लेन, मल्ही पुर रोड,
सहारनपुर

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