शुक्रवार, अगस्त 4

The Saharanpur Dot Com : पर किसलिये ?

2500 वर्ष से भी अधिक पुराना गौरवपूर्ण इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण योगदान, शहीदे-आज़म भगत सिंह की कर्म स्थली; अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त काष्ठकला उद्योग; शाकुंभरी देवी, भूतेश्वर, बागेश्वर, त्रिपुर बाला सुन्दरी देवी जैसे आध्यात्मिक तीर्थ स्थल; पं. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जैसे साहित्यकार; पंजाब, हरियाणा, उत्तरांचल और हिमाचल प्रदेश जैसे चार-चार प्रदेशों से निकटता; रिमाउंट ट्रेनिंग स्कूल और एयरफोर्स सरसावा जैसे सैन्य संस्थान; आई.टी.सी. और स्टार पेपर मिल जैसे विशाल उद्योगों समेत सात सौ से भी अधिक छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां; उत्तर भारत की प्रमुख व्यापारिक मंडी; मुंबई-अमृतसर व हावड़ा-अमृतसर जैसे देश के दो प्रमुख रेलमार्गों की नगर में मौजूदगी; आई.आई.टी. रुड़की, दारुल-उलूम देवबंद व मदरसा मज़ाहिर उलूम जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान; शहर के युवाओं में सृजनात्मकता को गति प्रदान कर रही दर्जनों साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थायें, कमिश्नरी का दर्ज़ा।
किसी भी शहर को प्रसिद्धि और सम्मान पाने के लिये, इससे भी अधिक कुछ चाहिये होता है क्या? पर इतनी विशिष्टतायें होते हुए भी सहारनपुर को देश में, प्रदेश में वह सम्मान हासिल नहीं है जिसका वह अधिकारी है। सहारनपुर को एक आध्यात्मिक नगरी, शिक्षा के प्रमुख केन्द्र और दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता था पर ऐसा नहीं किया गया। इसके सर्वथा विपरीत, सहारनपुर आज भी अनेकानेक समस्याओं से घिरा हुआ है जिनमें सर्वप्रमुख हैं - नागरिक सुविधाओं की कमी, जिधर भी नज़र दौड़ाओ - उधर गंदगी का साम्राज्य, टूटी-फूटी सड़कें, चरमराती हुई अस्त-व्यस्त यातायात व्यवस्था, बदहाल विद्युत व जल आपूर्ति, गंदे नाले के रूप में परिवर्तित हो चुकी नदियां और इन सब से बढ़कर -- सामान्य जन में नागरिकता के श्रेष्ठ गुणों का अभाव ! एक अजब सी तंद्रा में सोये पड़े हैं सहारनपुर के लोग ! उन की स्थिति कुछ कुछ हनुमान जी जैसी ही है जो एक श्राप के वशीभूत अपनी ही शक्तियों को भुलाये बैठे रहे । उनको इस तंद्रा से जगाया जाम्बवान ने । और एक बार हनुमान इस तंद्रा से जाग गये तो स्वयं में निहित शक्तियों के बल पर इतना कुछ कर डाला कि आज तक पूज्य हैं, वन्दनीय हैं।

सहारनपुर को उसका वह सम्मान मिले, जिस पर उसका हक बनता है, इसके लिये आवश्यक है कि सहारनपुर वासियों की भी तंद्रा टूटे, अपने प्रति और अपने नगर के प्रति दिखाई देने वाली नकारात्मक भावना समाप्त हो। जब तक अपने शहर को ’सड़ान्धपुर’ मानने की प्रवृत्ति नहीं बदलेगी, शहर के प्रति हमारा दुर्व्यवहार भी समाप्त नहीं होगा। अभी सहारनपुर वासी अपने शहर का सम्मान नहीं करते, इसीलिये अपने प्रति भी जो एक सहज आत्म-सम्मान की भावना उनमें दिखाई देनी चाहिये थी, वह भी कूड़े के ढेर में ही कहीं दबी हुई पड़ी है। उनको यह अहसास भूल गया है कि यदि दुनिया की निगाहों में सहारनपुर का सम्मान बढ़ेगा तो सहारनपुर वासियों का सम्मान स्वयमेव ही बढ़ेगा।

द सहारनपुर डॉट कॉम पोर्टल वेबसाइट सहारनपुर वासियों की इसी सोच को बदलने का एक अभिनव प्रयास है। सहारनपुर की एक उज्ज्वल छवि विश्व पटल पर स्थापित हो; इस शहर की अच्छाइयों और यहां की श्रेष्ठताओं को देखकर और उनके बारे में जानकर, पढ़कर उनमें अपने इस शहर के लिये सोया पड़ा प्यार और सम्मान पुनः जाग्रत हो; वे सब आपस में एक दूसरे को भी -- सहारनपुर वासी होने के नाते स्नेह व सम्मान से देखें;अपने नगर की बेहतरी के लिये कुछ करने की भावना उनके जागे; उनकी सृजनात्मक, सकारात्मक सोच को नये आयाम मिलें, दिशानिर्देश मिले, प्रोत्साहन मिले - यही सोच है द सहारनपुर डॉट कॉम के निर्माण के पीछे । जिस उत्साह से देश विदेश में बैठे सहारनपुर के युवावर्ग ने इस प्रयास का स्वागत किया है और जितनी तेजी से लोग इस पोर्टल पर आकर जुटने लगे हैं उससे आशा बंधने लगी है कि यह प्रयास निरर्थक नहीं रहेगा। सहारनपुर वासियों की सोई पड़ी सकारात्मकता को जिस मंच की तलाश थी, वह उनको मिल गया लगता है। अपने सहारनपुर के प्रति उनके हृदय में सोया हुआ प्यार न केवल जागने लगा है, वरन्‌ उमड़-घुमड़ कर स्वयं को प्रकट भी कर रहा है। द सहारनपुर डॉट कॉम पोर्टल ने सहारनपुर वासियों को इतना उत्साहित कर दिया है कि वे खुद अपनी ओर से सहायता की पेशकश कर रहे हैं, यथासंभव योगदान करने की इच्छा प्रकट कर रहे हैं।

अब आवश्यकता है तो बस इतनी कि इस आन्दोलन को और गति एवं शक्ति मिले। जो उत्साह की भावना आज कुछ हज़ार व्यक्तियों में दिखाई दे रही है, वह सहारनपुर के जन-जन में विस्तारित होती चली जाये। यदि सहारनपुर वासियों के मन में अपने शहर और जनपद के प्रति उत्साह, प्यार व सम्मान की भावना बलवती होगी तो यहां पसरी गंदगी को देखकर मन में क्षोभ भी उत्पन्न होगा और सहारनपुर की सभी समस्याओं का प्रभावी हल निकालने की आवश्यकता भी अनुभव होगी। अभी तो उत्साह विहीनता का यह आलम है कि गंदगी को भी जन-जन में स्वीकार्यता मिल गई है, अधिकांश लोगों ने इसे सहारनपुर की नियति मान लिया है। ’सड़ान्धपुर’ शब्द की उत्पत्ति इसी जन-स्वीकार्यता और इसी सुषुप्तावस्था से हुई है। पर जब जन-जागरण का बिगुल बजना आरंभ होगा तो हमारे शहर के नीति-नियन्ताओं की कुंभकर्णी निद्रा भी टूटेगी । जनता जाग जायेगी तो वे सब कैसे सोते रह सकेंगे?

कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि द सहारनपुर डॉट कॉम एक ऐसा प्रयास है जिसे आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व सहारनपुर के युवा वर्ग ने अपने सुदृढ़ कंधों पर ले लिया है। सहारनपुर के साहित्यकार, लेखक, कवि, विचारक, पत्रकार, समाजसेवी और आध्यात्मिक नेता भी इन युवाओं को मार्गदर्शन देने के लिये एकजुट हो रहे हैं। जिस कार्य को गुरुजनों का आशीर्वाद मिले, युवाओं की टीम जिसे आगे बढ़ाने के लिये तत्पर हो, उस कार्य की सफलता तो भगवान भी सुनिश्चित कर देते हैं। यही प्रभु से कामना भी है।

- सुशान्त सिंहल
संस्थापक निदेशक एवं संपादक
द सहारनपुर डॉट कॉम

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