मंगलवार, दिसंबर 4

दूसरा अध्याय नाटक का मंचन - नये समर्थ कलाकारों का आगाज़ !

पिछले तीन दशकों से सहारनपुर में रंगकर्म की मशाल अनवरत जलाये चल रहे ’अदाकार’ ग्रुप की नवीनतम नाट्य प्रस्तुति ’दूसरा अध्याय’ ने रंगमंच को पवन शर्मा के रूप में एक नये निर्देशक और आरती शर्मा के रूप में एक उदीयमान अभिनेत्री से परिचय कराया है।   अजय शुक्ला कृत ’दूसरा अध्याय’ नाटक 1993 में साहित्य कला परिषद्‌ द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था। इस नाटक में केवल दो ही पात्र हैं, लगभग  पूरा नाटक  एक रेस्टोरेंट में बातचीत के रूप में है।  स्वाभाविक ही है कि ये नाटक नाटकीय दृश्यत्व के बजाय कथात्मक अधिक है, अतः इसको रंगमंच पर लेकर आना स्वयं में चुनौतीपूर्ण कार्य है।  सहज और सरल भाषा में जीवन्त संवाद , स्त्री - पुरुष के सम्बन्धों में उलझनें और जटिलताएं और समाज में स्थापित मूल्यों पर सवाल खड़े करना ही इस नाटक की प्रमुख विशेषता है।









दि. 18 नवम्बर 2018 को आई.आई.टी. रुड़की के सहारनपुर स्थित आई.पी.टी. सभागार में मंचित इस नाटक में मुख्य भूमिकाओं में अशोक वर्मा और आरती शर्मा हैं जिन्होंने अभय और नीरजा की भूमिकाओं का भली प्रकार
निर्वहन किया है।  अशोक वर्मा ने पिछले कई दशकों में सहारनपुर के रंगमंच पर अपनी पहचान बनाने के बाद मुम्बई की फिल्म व टी.वी. इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई है। विधि परास्नातक आरती शर्मा एक सफल मॉडल के रूप में जानी जाती हैं किन्तु नाटक में अभिनय का संभवतः उनके लिये यह पहला ही अवसर रहा है और इस सुअवसर का उन्होंने बखूबी उपयोग करते हुए नाटक की मुख्य पात्र नीरजा को जीवन्त किया है।

नाटक की विषय वस्तु सिर्फ इतनी है कि एक ट्रेनिंग के दौरान अविवाहित अभय और विवाहित नीरजा की मुलाकात होती है और दोनों एक दूसरे की ओर खिंचते हैं।  अभय चाहता है कि नीरजा अपने पति और दो बच्चों को  छोड़ कर उसके साथ विवाह बन्धन में बंध जाये।  नीरजा सही और गलत, प्रेम और कर्तव्य के झंझावात में उलझी रहती है। उसको अभय अच्छा लगता है, दोनों की भेंट होती रहती हैं। अभय हर मुलाकात में नीरजा से कहता है कि वह अपने पति व बच्चों से किनारा करते हुए सदा सदा के लिये उसकी हो जाये।  दूसरी ओर नीरजा अपने परिवार को तिलांजलि देने और इस नये रिश्ते से जुड़ने का साहस नहीं बटोर पाती और जब भी अभय से मिलती है, दोनों के बीच इसी  बात पर तकरार आरंभ हो जाती है।  अभय की कुंठा उसे नीरजा पर आक्रोश व्यक्त करने के लिये भड़काती रहती है।  दूसरी ओर,  नीरजा अभय को मनाती रहती है,  उससे और समय की मांग करती रहती है पर अभय का क्षोभ बढ़ते- बढ़ते इस स्थिति में आ जाता है कि अभय अपने जीवन में आगे बढ़ जाता है और नीरजा वापस अपने जीवन में।  अनेक वर्षों के बाद वे पुनः मिलते हैं। अब नीरजा अभय का साथ चाहती है परन्तु अभय के पास अब समय नहीं है और वह पुनः मिलने की बात करके चला जाता है।  पूरी कहानी फ्लैशबैक में अभय के माध्यम से कही गयी है।

दो मुख्य पात्रों के अलावा रेस्टोरेंट के वेटर की भूमिका में पारस रन्धावा ने कहीं - कहीं बोझिल हो रहे नाटक में कुछ मनोरंजक क्षण डाले हैं।  एक दृश्य में अभय और नीरजा रेस्टोरेंट में बैठे हुए कल्पना लोक में खो जाते हैं और स्वयं को एक दूसरे की बाहों में नृत्य करते हुए दिवास्वप्न देखने लगते हैं। इस दृश्य को नायक खन्ना की कोरियोग्राफी के सहयोग से निर्देशक ने बड़ी खूबसूरती से उकेरा है। अभय और नीरजा का यह दिवास्वप्न जीने के लिये दो अन्य कलाकारों - अनुषी अग्रवाल और शुभम का सहयोग लिया गया है। 

नाटक में पार्श्व संगीत विवेक आर्यन ने दिया है।  ध्वनि व प्रकाश व्यवस्था धीरज बत्रा ने संभाली।  वरिष्ठ रंगकर्मी विक्रान्त जैन ने सैट निर्माण में शानदार कल्पनाशीलता का परिचय दिया और निर्देशक ने उसका बखूबी इस्तेमाल भी किया।  खास तौर पर ट्रेन का सेट जिसमें अभय और नीरजा एक दूसरे से मिलते हैं बहुत प्रभावी रीति से मंचित किया गया।  यदि तकनीकी खामियों की बात की जाये तो नाटक की शुरुआत से लगभग आधा घंटे तक अभय और नीरजा को दिये गये कॉलर माइक हर अनावश्यक आवाज़ और शोरगुल भी पकड़ते रहे। एक दृश्य से दूसरे दृश्य पर जाने के दौरान जब मंच पर अंधकार था और मंच सज्जा में परिवर्तन किये जा रहे थे तो माइक को उस दौरान बन्द किया जा सकता था ताकि वह अनावश्यक आवाज़ न पकड़ता रहे।  कहीं - कहीं प्रकाश परिकल्पना में समन्वय की कमी भी अनुभव होती रही जिसके कारण मंच पर मौजूद कलाकार प्रकाश व्यवस्था में परिवर्तन की इंतज़ार करते अनुभव हुए।   पर कुल मिला कर यह एक सफल प्रस्तुति रही और इसका मुख्य लाभ ये रहा कि सहारनपुर रंगमंच को पवन शर्मा के रूप में एक समर्थ निर्देशक और आरती शर्मा के रूप में एक प्रतिभावान अभिनेत्री मिली।

नाटक से पूर्व नगर विधायक श्री संजय गर्ग, जो खुद भी रंगकर्मी रहे हैं और अदाकार ग्रुप के संरक्षक हैं, दर्शकों का स्वागत करने के लिये उपस्थित हुए।  नाटक पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिये पद्मश्री भारतभूषण, श्री शिव कुमार गौड़, डा. संजीव मिगलानी व डा. नैना मिगलानी आदि उपस्थित हुए।  दर्शकों में समाजसेवी श्री योगेश दहिया, आई आई टी सहारनपुर परिसर के प्रमुख डा. वाई.एस. नेगी, विपिन अग्रवाल, फादर फारसिस, शहज़ाद अहमद, डा. संजीव जैन, डा. संदीप गुप्ता, सुरेन्द्र चौहान, के. के. गर्ग, इन्द्रजीत सिंह,  मनजीत सिंह अरोड़ा, नीना धींगड़ा, परवेज़ सागर, राजीव उपाध्याय, प्रशांत राजन, राजीव सिंहल आदि नाटक का आनन्द लेते हुए नज़र आये।

अजय शुक्ला कृत नाटक की विषय वस्तु पर संपादकीय टिप्पणी   

एक व्यक्ति ने मैरिज काउंसलर से अपनी पत्नी के बारे में क्षोभ व्यक्त किया कि वह बहुत शक्की मिजाज़ की है।  मुझे ऑफिस के काम से अक्सर दूसरे शहरों में मीटिंग - सेमिनार आदि के लिये जान-आना पड़ता है।  जब भी मैं किसी मीटिंग या सेमिनार के लिये जाता हूं, वह मुझसे झगड़ा करने लगती है,  मुझे बार-बार फोन करती है, मैं कहां हूं, क्या कर रहा हूं, और कौन - कौन हैं, शाम को मैं कहां था, किसके साथ था, क्या कर रहा था, सवाल पूछ पूछ कर मेरी नाक में दम करके रखती है।  मेरी इस समस्या का क्या हल है?

मैरिज काउंसलर ने पूछा कि आपका विवाह कब हुआ था,  प्रेम विवाह था या माता-पिता की इच्छा से हुआ था तो उस व्यक्ति ने बताया कि पहला विवाह सात वर्ष पूर्व माता-पिता की मर्ज़ी से हुआ था।  ये मेरी दूसरी पत्नी है और हमारा दो वर्ष पूर्व प्रेम विवाह हुआ था।  इस विवाह से पहले पहली पत्नी से मेरा विवाह विच्छेद हो चुका है।
मैरिज काउंसलर ने फिर पूछा कि आपकी मुलाकात आपकी दूसरी पत्नी से कब - कहां और कैसे हुई थी?  इस पर उस व्यक्ति ने बताया कि वह ढाई साल पहले ऑफिस की एक मीटिंग के सिलसिले में बंगलौर गया था, वहीं मीटिंग के दौरान ही इस युवती से परिचय हुआ था।  तीन दिन के टूर में हम एक दूसरे के बहुत करीब आ गये थे और एक दूसरे को बहुत चाहने लगे थे।  बस, मैने अपनी पत्नी को तलाक देकर दूसरी शादी कर ली थी।   मेरे दोनों बच्चे भी मेरी पूर्व पत्नी के पास ही हैं।

मैरिज काउंसलर ने बताया कि आपकी समस्या का मूल यहीं है।  आपकी  दूसरी पत्नी को लगता है कि जैसे आपने एक मीटिंग में मिल गयी एक युवती की खातिर  पांच वर्ष पुराने विवाह संबंध को समाप्त कर दिया, दोनों बच्चों के प्यार की भी आपने परवाह नहीं की वैसे ही,  आपको  पुनः किसी मीटिंग में एक और लड़की मिल गयी तो आप अपनी दूसरी पत्नी को भी त्यागने में देर नहीं करेंगे।   इस असुरक्षा की भावना ने ही उसे आप पर निरन्तर निगाह रखने और आप पर शक करते रहने के लिये विवश किया हुआ है और आप इस बारे में आसानी से अपनी पत्नी को आश्वस्त कर सकेंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता। 
     
अजय शुक्ला कृत नाटक दूसरा अध्याय मानवीय स्वभाव के इस मूल पहलू को पूरी तरह से नज़र अन्दाज़ करते हुए, एक अविवाहित पुरुष और एक विवाहित महिला के बीच के प्रेम का कथानक लेकर चलता है और विवाहित महिला द्वारा अपना घर, अपना पति और अपने बच्चे न त्याग पाने को ’खोखले मूल्य’ घोषित करता है, उन पर सवाल खड़े करता है।
  
नाटककार यह सिद्ध करने का प्रयास करता प्रतीत होता है कि नीरजा ने अपने पति व बच्चों की खातिर अपने ’प्रेम’ को अकेला छोड़ कर भीरुता का परिचय दिया।  ऐसे ’खोखले’ सामाजिक मूल्यों की खातिर वह अपने पति और बच्चों को त्याग नहीं पाई और जीवन भर अपने प्रेम की चाहत में दुःखी रही।

स्त्री या पुरुष का किसी नये व्यक्ति के संपर्क में आना, उसके प्रति सम्मोहन / आकर्षण अनुभव करना दैनन्दिन अनुभव की बात है और इसमें नया कुछ भी नहीं है।  यह क्षणिक सम्मोहन है, आकर्षण है जिसे लोग प्यार समझ बैठते हैं।  यदि कोई आत्मकेन्द्रित व्यक्ति अपने इस नये - नये सम्मोहन में फंस कर अपने परिवार और पुराने रिश्तों को तिलांजलि दे दे और नये संबंध स्थापित कर ले तो बहुत जल्द ही उसका भ्रम टूट जाता है।  नया संबंध कभी भी उतनी गहराई नहीं ले पाता क्योंकि नये संबंध स्थापित करने वाले युगल अविश्वास की भावना से आशंकित रहते हैं।

हम पाठकों से भी उनके विचार इस बारे में जानना चाहेंगे।  कृपया अपने कमेंट के रूप में बतायें कि क्या नीरजा ने जो किया, वह सही था?  क्या उसे अपने पति व बच्चों को पीछे छोड़ कर अपने प्यार को पा लेना चाहिये था?  क्या  अभय वास्तव में नीरजा से प्यार करता था जितना नीरजा अभय से करती थी? 

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