रविवार, मई 19

मां शाकुंभरी देवी दरबार


मां शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ

विश्व के विभिन्न भागों में रहने वाले आस्थावान्‌‍ लोगों के लिये सहारनपुर का सीधा सा अर्थ है - मां शाकुम्भरी देवी का पावन शक्तिपीठ तीर्थस्थल ! मां शाकुम्भरी देवी के दरबार की चरण-रज माथे पर लगाने के लिये, अपनी अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिये प्रतिवर्ष लाखों लोग हज़ारों किमी की कष्टकर यात्रा तय करके भी सहारनपुर आते हैं। उनको सहारनपुर नगर के प्रति कोई आकर्षण हो यह कतई आवश्यक नहीं है। उनका तो बस एक ही लक्ष्य होता है - नगर से लगभग बयालीस किमी दूर शिवालिक की तलहटी में विद्यमान मां शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ तक पहुंचना। वर्षा ऋतु में दरबार तक पहुंचना किसी भी वाहन के लिये संभव नहीं रह जाता क्योंकि मार्ग में पड़ने वाली बरसाती नदी जब अपने रौद्र रूप में आ जाती है तो उसके तीव्र प्रवाह में बस या ट्रक को नियंत्रित करना भी सहज नहीं रहता, कार, स्कूटर और मोटर साइकिल की तो बिसात ही क्या है। पर यह नदी जितनी तेजी से चढ़ती है, उतनी ही तेजी से उतर भी जाती है।

इस शक्तिपीठ की प्राचीनता को लेकर इतिहासकारों व पुरातत्वविदों में कोई एक सर्वमान्य मत नहीं है। पर इतना अवश्य है कि सर्वमनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली, कष्टों का हरण करने वाली इस देवी की मान्यता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली जाती है। प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्रियों की भीड़, हर समय चलते रहने वाले भंडारे, नवरात्रों में दर्शनार्थियों की मीलों लंबी पंक्तियां, इस दरबार को चढ़ावे के रूप में प्राप्त हो रही अकूत आय अपनी कहानी स्वयं बयान करने में सक्षम है।

कैसे पहुंचें ?

हरियाणा - पंजाब या दिल्ली की ओर से आ रहे दर्शनार्थियों के लिये सहारनपुर से होकर जाना सबसे सुगम है। इसके लिये सहारनपुर से उत्तर की ओर सहारनपुर - विकासनगर - चकरौता राष्ट्रीय राजमार्ग पर बेहट होकर जाना होता है जो सहारनपुर से पच्चीस किमी की दूरी पर है। (बेहट सहारनपुर जिले की एक प्रमुख तहसील है) । यहां से शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ के लिये रास्ता अलग हो जाता है जो लगभग पन्द्रह किमी लम्बा है। अन्तिम एक किलोमीटर की यात्रा नदी में से होकर की जाती है। यह नदी वर्ष में अधिकांश समय सूखी रहती है। यदि आप अपने वाहन से सहारनपुर तक पहुंचे हैं तो दरबार तक पहुंचना आपके लिये किसी भी प्रकार से कठिन नहीं है। सहारनपुर - विकासनगर राष्ट्रीय राजमार्ग व्यस्त सड़क है अतः विकासनगर की ओर जाने वाली या विकासनगर की ओर से आने वाली किसी भी बस में आप बेहट तक तो बिना परेशानी के आ ही सकते हैं। नवरात्र के दिनों में तो आपको सैंकड़ों - हज़ारों ग्रामीण बैलगाड़ियों में, झोटा-बुग्गियों में, ट्रैक्टर ट्रॉलियों में या पैदल ही मां का गुणगान करते हुए जाते मिल जायेंगे। सड़क पर लेट - लेट कर दरबार तक की दूरी तय करने वालों की भी कमी नहीं है।




लेट-लेट कर मां के दरबार तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भी यहां कोई कमी नहीं है।

सहारनपुर से अनेक बसें विशेष रूप से मां शाकुम्भरी देवी दर्शन के निमित्त भी चलाई जाती हैं जो सहारनपुर में स्थित बेहट बस अड्डे से मिल जाती हैं। यदि आप पूरी टैक्सी करना चाहें तो प्राइवेट टैक्सी (इंडिका, टवेरा, इनोवा, सुमो आदि) भी सहारनपुर नगर में ही सरलता से उपलब्ध हो जाती हैं।

देहरादून - ऋषिकेश - रुड़की - हरिद्वार से कैसे पहुंचें?

देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार की ओर से आने वालों के लिये बेहट पहुंचने के लिये सहारनपुर तक आना आवश्यक नहीं है। देहरादून - दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर छुटमलपुर के पास से कलसिया - बेहट को जाने के लिये अच्छी सड़क है। लगभग इक्कीस किमी लम्बी यह सड़क सहारनपुर - विकासनगर - चकरौता राजमार्ग (यानि दिल्ली यमुनोत्री राजमार्ग) को देहरादून - सहारनपुर - दिल्ली राजमार्ग से जोड़ती है। अतः देहरादून, रुड़की, हरिद्वार, ऋषिकेश की ओर से आने वाले तीर्थयात्री छुटमलपुर से देहरादून की ओर दो किमी पर खुल रही फतहपुर - कलसिया सड़क पकड़ कर बेहट पहुंच सकते हैं।



यूं तो शिवालिक पर्वत श्रंखला पार करने के तुरंत बाद, विकासनगर - सहारनपुर मार्ग पर बादशाहीबाग से तथा देहरादून - सहारनपुर - दिल्ली राजमार्ग पर मोहण्ड से भी कच्चा रास्ता सीधे शाकुम्भरी मंदिर की ओर जाता है पर इस रास्ते पर पड़ने वाले जंगल में पूरी की पूरी बस भी लुट चुकी हैं अतः पुलिस कर्मी भी आपको यही सलाह देते हैं कि इस कच्चे रास्ते का प्रयोग करके हीरो बनने का प्रयास न करें। यदि कुछ अनहोनी घटती है तो वह जिम्मेदार नहीं होंगे।

प्रथम दर्शन बाबा भूरा देव के





मां शाकुंभरी देवी के अनन्य सेवक भूरादेव के दर्शन किये बिना मां के दर्शन अधूरे माने जाते हैं।
भूरा देव मंदिर में भी नवरात्र के दिनों में बहुत अधिक भीड़ होती है जिसको नियंत्रित करने के लिये ये रेलिंग अभी लगाई गयी हैं।
बेहट - शाकुम्भरी मार्ग बाबा भूरा देव के मन्दिर पर पहुंच कर समाप्त हो जाता है। प्रचलित मान्यता है कि मां शाकुम्भरी देवी के दर्शन करने से पहले बाबा भूरा देव के दर्शन करने चाहियें। अतः सभी तीर्थयात्री यहां रुकते हैं, बाबा भूरादेव के दर्शन करते हैं, तरोताज़ा होकर बची हुई एक किमी की यात्रा पैदल या अपने वाहन से सम्पन्न करते हुए मां शाकुंभरी देवी के दरबार तक पहुंचते हैं।



मुख्य दरबार में स्थित प्रतिमायें




शिवालिक पर्वत श्रंखला की तलहटी में विद्यमान मां शाकुम्भरी देवी के मंदिर का वाह्य दृश्य
शाकुम्भरी देवी मन्दिर में चार प्रतिमायें पिंडी के रूप में प्रतिष्ठित हैं - शाकुम्भरी देवी, उनके दाईं ओर भीमा देवी तथा भ्रामरी देवी तथा बाईं ओर शताक्षी देवी। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में इन देवियों का दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के नाते परिचय मिलता है। प्रतिमायें चार भले ही हों, पर यह मन्दिर मूलतः मां शाकुम्भरी देवी का ही माना जाता है। (कई स्थानों पर आप शाकुम्भरी देवी के स्थान पर शाकम्भरी देवी भी लिखा हुआ देख सकते हैं।) इस मंदिर के भीतर कैमरा व मोबाइल का उपयोग करना निषिद्ध है। मंदिर के प्रबन्धकों ने मंदिर के भीतर के चित्र अलग से बेचने की व्यवस्था की हुई लगती है।

छिन्नमस्ता देवी का मंदिर

शाकुम्भरी देवी मंदिर से वापसी के समय दायें हाथ पर कई सीढ़ियां चढ़ कर एक और मंदिर दिखाई देता है जो मां छिन्नमस्ता का है। अभी हाल ही में इस मंदिर की सीढ़ियों का जीर्णोद्धार किया गया है और दोनों ओर रेलिंग भी लगाई गयी है। इस मंदिर के प्रांगण में एक मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष भी है जिस पर, मनोकामना लेकर आने वाले व्यक्ति धागा बांध कर जाते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः आकर धागा खोलते हैं। ऐसे अनेक लोग मां शाकुंभरी देवी परिसर में स्थिति धर्मशालाओं में भंडारा भी आयोजित करते हैं।

धर्मशालाएं

शाकुंभरी देवी में श्रद्धालुओं के लिये रात्रि विश्राम की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है, यही माना जाना चाहिये। जो दो-तीन धर्मशालाएं हैं भी, उनमें पलंग / खाट और बिस्तरे मिलने की कोई संभावना नहीं है। दरी पर अपना बिस्तर डाल कर कोई सोना चाहे तो उतना प्रबन्ध तो हो ही सकता है। आम तौर पर ये धर्मशालाएं दिन में भंडारे के आयोजन के लिये ही उपयोग में आती हैं। हलवाई और उनके कारीगर रात को यहां राशन और बर्तन - चूल्हे आदि लेकर पहुंच जाते हैं और जो भंडारा आयोजन कर रहे हैं, वह सुबह आते हैं और दोपहर तक भंडारा संपन्न हो जाता है तो उसके बाद वापिस लौट जाते हैं।

मां शाकुंभरी देवी जयन्ती समारोह

जनवरी मास के दूसरे सप्ताह में शाकुंभरी देवी परिसर में स्थित शंकराचार्य आश्रम द्वारा मां शाकुंभरी देवी जयन्ती समारोह का आयोजन बड़ी धूमधाम से किया जाता है।


नवरात्र मेला

शाकुम्भरी देवी मंदिर के दरबार में लगने वाला नवरात्र मेला आस - पास के गांवों व शहरों से ही नहीं अपितु दूर दूर से श्रद्धालुओं को यहां खींच लाता है। ऐसा नहीं है कि मेले में कुछ विशेष सामान खरीदा जा सकता हो। पर नवरात्र के 9 दिनों में मां के दर्शन की लालसा में हज़ारों श्रद्धालु ट्रैक्टर ट्रॉली में, बस में, कार, स्कूटर और मोटर साइकिल से तो आते ही हैं, पैदल आने वालों की भी कोई कमी नहीं है।











श्रद्धा का आलम ये है कि हाथ-ठेली पर मां का मंदिर, रंग बिरंगी लाइटें व डी.जे. लगा कर सहारनपुर से मां शाकुंभरी देवी दरबार की 42 किमी की यात्रा पैदल नाचते - गाते हुए करने वाले श्रद्धालुओं की अनेक टोलियां सड़क पर दिखाई देती रहती हैं।इन लोगों की डिक्शनरी में ’असुविधा’ जैसा कोई शब्द शायद है ही नहीं। सड़क अच्छी हो तो भी जाना है, टूटी - फूटी हो, तो भी कोई परवाह नहीं! झुलसाने वाली भीषण गर्मी हो तो भी पांव के छालों की चिन्ता नहीं और सर्दी या बरसात हो तो भी इनके पांव नहीं रुकते। ढोल - नगाड़े का स्वर और माता की भेंटें इनको अक्षय ऊर्जा देती हैं। 
 



शाकुंभरी मैया के दर्शन के बाद कढ़ी और पूरी आदि का भोग लगाना तो बनता ही है।






  

आर पी शुक्ल - हाइकुकार

क्या नहीं हैं विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री आर.पी. शुक्ल?  कहानीकार, ग़ज़लकार, मूर्तिकार, पेंटर, कवि, उपन्यासकार, संस्मरण लेखक, ओजस्वी वक्ता और हां,  कर्तव्यनिष्ठ एवं कुशल  प्रशासक !   सहारनपुर मंडल के मंडलायुक्त के रूप में हमारा उनसे परिचय हुआ।  धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू सामने आते गये और सहारनपुर वासी उनके और वह सहारनपुर के मुरीद होते चले गये!   यहीं रह कर उनकी भेंट प्रख्यात ग़ज़लकार और हाइकुकार  श्री कमलेश भट्ट कमल से भी हुई जो उन दिनों सहारनपुर में सहायक बिक्रीकर आयुक्त थे।  श्री कमलेश भट्ट ’कमल’ ने उनको जापानी कविता शैली ’हाइकु’ से परिचित कराया।  बस, फिर क्या था, आर.पी. शुक्ल कवि और ग़ज़लकार तो पहले से ही थे, अब हाइकु लिखने की भी धुन सवार हो गयी।  उनकी कुछ हाइकु रचनाएं हम आपके लिये यहां ले आये हैं।  बताइये, कैसी लगीं?   

कमल था
जो बना गया मुझे
हाइकुकार !

*****
वह रोकता
तो रुक भी जाता मैं
रोकता तो वो ।
* * *
और कौन है
दुश्मन मेरा, दोस्त
मैं ही खुद हूं।
* * *
लौटेगा जब
खून से लथपथ,
माथा चूमूंगा।
* * *
चाहूं हूं तुझे
गांव की माटी क्योंकि
जानू हूं तुझे ।

* * *

खुदा है तो आ
मेरी मदद कर
वरना बुत है।

* * *

हिरन दौड़ा
मरीचिका के पीछे
तो पानी हंसा ।
* * *
जीवन मेरे
मैं गाता हूं तू भी गा
साथ रहेगा !

* * *

चुम्बक हूं मैं
खींच लाऊंगा तुझे
ऐ मेरे यार !

* * *

शालीन होना
मुश्किल बहुत है
कोशिश कर !

* * *

गीत या गाली
कुछ भी कहो पर
लय में तो हो !

* * *

वो चलता है
बने रास्तों पे किन्तु
मैं बनाता हूं !

* * *
मारना ही था
तो पैदा क्यूं किया था
मज़ाक़ है क्या ?

* * *
घर कहां है
घुस गया बाज़ार
रिश्ते - नातों में ।

* * *
मेरे ही लिये
रात भर जागा है
चांद बेचारा !

* * *
उसकी बातें
समझ नहीं आतीं
सच बोले है !

* * *
रजनीगंधा
बैठ, देख कितनी
मदमस्त है।

* * *
ए.सी. में बैठ
इतना न इतरा
जम जायेगा!

* * *
घर छोटा है
क्या रह लोगे तुम
दिल बड़ा है।

* * *
ठीक नहीं है
संबंधों में दरार
जल्दी भर ले !

- आर.पी. शुक्ल

जो विशेष पसन्द किये गये !